Friday, 27 February 2015

  कैलाश गुफा जशपुर जिला की यात्रा 


मै वर्ष २०१३ में गर्मी के मौसम  में रायपुर से  शासकीय कार्यवश अम्बिकापुर नगर गया था।  मुझे घूमने का शौक है ,मैंने वहा  पर  लोगो से आसपास के घूमने की जगह की जानकारी ली। लोगो ने मैनपाट ,सामरीपाट  कैलाशगुफा आदि जगह की जानकारी दी।श्री नेताम जी मेरे मित्र है , जो की वर्तमान में पंचायत ट्रेनिंग सेंटर में फेकल्टी मेंबर के रूप में कार्यरत है ने मुझे अपने साथ अगले दिन  कैलाश गुफा देखने  चलने को  आग्रह किया। जगह की खासियत पूछने पर इस जगह के बारे में उन्होंने बताया कि   अम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में 60 किमी. पर स्थित सामरबार नामक स्थान है,



 जहां पर प्राकृतिक वन सुषमा के बीच कैलाश गुफा स्थित है। इसे परम पूज्य संत रामेश्वर गहिरा गुरू जी जिनका उस छेत्र में काफी सम्मान था,  नें पहाडी चटटानो को तराश कर निर्मित करवाया है। यहाँ  महाशिवरात्रि पर विशाल मेंला लगता है। इसके दर्शनीय स्थल गुफा निर्मित शिव पार्वती मंदिरबाघ माडाबधद्र्त बीरयज्ञ मंड्पजल प्रपातगुरूकुल संस्कृत विद्यालयगहिरा गुरू आश्रम है।
 इस जगह का विवरण जानने  के लिए लगा सुचना फलक  :-

तब मुझे भी ख्याल आया की इस जगह की तारीफ जब मै रायगढ़ में  पदस्थ था तो भी अनेको   मित्रो ने की  , किन्तु मै यहां  आ  नही पाया था।  दूसरे दिन  जीप से श्री नेताम और उनके  एक और मित्र के साथ चल पड़े ,रास्ते काफी सुहावने थे। कहि कहि तेज़ हवा के झोको से ख्याल आता की ये जगह पवन चक्की या इनसे ऊर्जा पैदा कर उसका उपयोग किया जा सकता है। कुछ जगह छत्तीसगढ़ शासन की पहल भी इस दिशा में दिखाई दी।  


 वैसे    जशपुर  जिला के  ब्लॉक मुख्यालय  बागीचा   से यह स्थान   लगभग 120 किलोमीटर दूर है। यह स्थान जशपुर जिले को पर्यटन के क्षेत्र में अलग पहचान देने वाला प्रमुख दर्षनीय स्थल है। कैलाश गुफा को  पहाड़ में चट्टानों को  मात्र 27 दिनों में खुदाई और  काटने से बनाया गया है। समीपस्थ ग्राम सामरबार  में  संस्कृत महाविद्यालय  है। यह हमारे देश में   दूसरा संस्कृत महाविद्यालय   है।  जो की श्री रामेश्वर गहिरा गुरू जी की प्रेरणा से  निर्मित है।  





बगीचा बतौली मुख्य सड़क के बाद कैलाश गुफा पहुंचने वाली 14 कि.मी. की उबड़ खाबड़ सड़क पर जगह जगह नुकीले पत्थर और गड्ढो के चलते हमे  यहॉं  पहुंचने में दिक्कते तो हो रही थी ,पता नही इस सड़क को क्यों नही बनाया गया है।  बगीचा बतौली की पक्की सड़क छोड़ने के बाद ग्राम मैनी से गुफा पहुंचने के लिए कच्ची सड़क पर पत्थरों की भरमार और बड़े बड़े गड्ढों के चलते कैलाश गुफा पहुंचने से पहले ही हमारा  मन खिन्न सा  हो गया ।जशपुर जिले को पर्यटन के क्षेत्र में अलग पहचान देने वाला यह  स्थल कैलाश गुफा तक पहुंचने वाली सड़क की बदहाली  के चलते ही शायद गर्मी के दिनों में भी यह स्थान सुनसान ही था।  महज 14 कि.मी.की दूरी को दो घंटो में तय करने से बाहर का सैलानी इधर दूसरी बार आने का नाम नहीं लेते  है। बीच रास्ते में वाहन खराब होने के बाद दूर दूर तक गाव नही होने से  मदद मिलने की उम्मीद भी  नहीं रहती  है। 

अंबिकापुर  से यहॉं  पहुंचे मेरे साथ के लोगो  ने बताया कि इस धार्मिक और रमणीय स्थल पर वे एक दशक पहले आए थे।उस समय यहॉं  की कच्ची सड़क की हालत आज की तुलना में  काफी अच्छी थी। किन्तु अभी तो जीप को भी सम्हाल कर चलाना पड़  रहा था। मुरम जैसी लाल मिटटी वाली भूमि आलू ,टमाटर की खेती के लिए प्रसिद्ध  है। 
\किन्तु  कैलाश गुफा के समीप पहुचने पर चारो ओर ऊंची पहाड़ियां तथा दूर दूर तक फैली हरियाली के साथ  झर झर  झरते  झरनों का रमणीय दृष्य को देखते ही हमारी  सारी  थकान उतर गयी  यहाँ पर सुन्दर   झरने लगभग ४० फ़ीट ऊपर से गिरते और उची उची पहाड़ो के बीच  घने दरख्तो के बीच से बहते हुए  और केले ,आम  के  काफी तादाद में लगे  वृक्ष यहाँ की  सुंदरता और आकर्षण बढ़ा रहे हैं। कैलाश गुफा में  पहाड़ों  को काटकर बनाये गए गुफा वाले कमरो जिसके बाहर की दिवार में टपकते पानी की बुँदे और इसमें  स्थापित प्राचीन शिव मंदिर का आकर्षण के चलते भी यह पर्यटन स्थल अब  दूर दूर तक अपनी पहचान बना चुका है। बताते है की यहां  पर अनेको दुर्लभ जड़ी बूटी पाई जाती है।  यहॉं  पर सैलानियों की सुविधा पर  काफी ध्यान  देने की आवश्यकता है। जगह के सुनसान होने के कारण कैलाश गुफा आश्रम के पुजारी का कहना था कि इस स्थल पर आवागमन के साधन का अभाव तथा सड़कों की दुर्दषा के चलते सैलानियों की भीड़ पर विपरीत असर पड़ा है। कैलाशगुफा के आस पास रेस्ट हाउस बना कर इस स्थल को विकसित किया जा सकता है। शासन को इस दिशा  में सार्थक प्रयास करने  चाहिए। 



 कैलाश गुफा का प्रमुख   प्राचीन शिव मंदिर के आसपास काले बन्दरों का उत्पात भी बढ़ गया है। इस रमणीय स्थल पर प्रमुख आकर्षण का केन्द्र के रूप में काफी उंचाई से गिरने वाला झरना को माना जाता था। इन दिनों लगभग 40 फीट की ऊँचाई से गिरने वाली पानी की मोटी धारा भी अब लुप्त होकर यहॉं  पानी का पतला झरना ही रह गया है। किन्तु यहॉं पर पत्थरों में काई और कचरे की भरमार रहने से कोई भी सैलानी यहॉं  नहाने का आनंद नहीं ले पाता है। मेरे ड्राइवर ने भी  ट्यूबवैल में नहाना पसंद किया। ,वहां के स्थानीय लोगो से  हमने केले और आम खरीद कर खाए ,वहाँ के आम काफी मीठे है  और किसी भी प्रकार के अन्य नास्ते सामग्री  वहां  उपलब्ध नही थे।  हम लोगो ने  कैलाश गुफा में व्यस्थाके आभाव के  चलते   जल्द से जल्द अँधेरा होने से पहले  वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझे । क्युकी यहाँ  पर जंगली जानवर भी आते रहते है। 

    Devendra Kumar Sharma
113 ,sundarnagar ,Raipur ,chattisgadh

Sunday, 15 February 2015

 जादू -टोना  करने वालो की भूमि जब छत्तीसगढ़ को समझा जाता था - (land of witches )                             (कमज़ोर दिल वाले इसे न पढ़े )

जन साधारण में  टोनही या डायन  का अंधविश्वास

लोग माने या नही माने किन्तु यह सत्य ही है की  अंधविश्वास के चलते टोनही ,डायन या प्रेतीन , का नाम आज भी  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में भय पैदा कर देने के लिए पर्याप्त है।  सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं शहरी इलाकों में भी टोना-टोटका को लेकर आम लोगों के मन में संशय बना रहता है।  इस कथित काला जादू को लेकर टोना टोटका और टोनही जैसे संवेदनशील मुद्दे आज भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों मे  अपना प्रभाव रखती है। और इससे बचने के उपाय आम जन आज भी  करते ही रहते है।   


मेरे इस लेख को प्रकाशित करने का उद्देश्य अंधविश्वास फैलाना नही है ,और न ही इसके प्रमाणिकता के लिए  मेरे पास कोई प्रमाण ही है। इसे आप वास्तविक भी न  ही माने।मैंने सिर्फ  बचपन से आज तक  लोगो से सुनी हुयी बाते ,और लोगो से हुयी चर्चा और  census of  india  १९६१ में श्री के . सी दुबे ,और उनकी टीम जिन्होंने बालोद जिले (तब दुर्ग ) में गुंडरदेही के ग्राम कोसा का सर्वे किया था ,में लिए  गए  तथ्य  जो की  पुस्तक में लिखा गया है  ही इसका आधार है। लेकिन आज के सन्दर्भ में भी ये मान्य तथ्य नही है। सिर्फ मनोरंजन के लिए ही मेरे द्वारा लिखा गया है जो की सिर्फ सुनी सुनाई ही बातो पर है। 


 पर भूतप्रेत का अस्तित्व  साधु संतो, धार्मिक आध्यात्मिक उल्लेखों और परामनोविज्ञान की शोध और निष्कर्षों में भी उनके अस्तित्व के कई प्रमाण मिलते हैं। फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि मृत्यु के बाद जीवन का कोई भी अस्तित्व रहता हो या नहीं। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि भूतप्रेत कितने भी ताकतवार हों, वह मनुष्य का कोई अहित नहीं कर सकते। खैर छोड़िये इस बात को आगे 




 पुस्तक के अनुसार हेविट ने १८६९ में छत्तीसगढ़ के बारे में अपने रिपोर्ट में लिख कर प्रकाशित किया था , की छत्तीसगढ़ को बाहर के लोग चुड़ैलों की भूमि (land of witches ) समझते है। और उनकी धारणा  2nd  वर्ल्ड वॉर ख़त्म होने  के बाद भी छत्तीसगढ़ के   आर्थिक विकास होने के बावजूद भी कायम थे। देश की आज़ादी के बाद नए कल कारखाने खुलने लोगो के रोज़गार के लिए शहर की और पलायन होने से और उनका शहरीकरण होने से  इस कलंक से धीरे धीरे  मुक्ति मिलने लगी। और यह कलंक अंदरुनी ,और पहुंच विहीन गाव तक सिमित हो गए। जो की अभी भी कायम है.

 छत्तीसगढ़ में ये विचेस मर्द है तो टोन्हा और औरत हो तो टोनहिन कहलाने लगे। यह शब्द टोना मतलब काला जादू से लिया गया है। 

 श्री के सी दुबे तत्कालीन डेपुटी सुप्रिन्टेण्डेन्ट   सेन्सस ऑफ़ इंडिया  के अनुसार उन्होंने सुना था की   बिन्द्रानवागढ़ के गांव देबनाई का  नागा गोंड का उदाहरण दिया है जो की ( टाइगर ) शेर   के रूप में आकर 08 लोगो को नुकसान पंहुचा चूका है। और जिसे वर्ष 38 या 39  में ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार किया था। जादू टोना का गहन जानकार था। और वेश बदलने में माहिर था।  और इस बात की प्रमाण तत्कालीन रिकॉर्ड में दर्ज़ भी है। 

 श्री जी जगत्पति तत्कालीन  जॉइंट सेक्रेटरी गृह मंत्रालय  भारत शासन ने भी २७/७/1966 को लिखा था की भिलाई स्टील प्लांट जैसे आधुनिक तीर्थ से 15 मील  के भीतर के गावो तक में लोग बुरी आत्माओ की उपस्थिति को आज भी लोग मानते है।  तो न जाने पहुच विहीन  छेत्रो में क्या   हाल होगा। इसके निजात दिलाने हमे प्रयास की आवश्यकता है। ( उन्होंने यह बात दुर्ग के  समीपस्थ गाव कोसा के सम्पूर्ण  विलेज सर्वे करने के बाद  उसके  आधार से लिखा था) यह पुस्तक मेरे पास  जबकि  मै  गुंडरदेही विकासखण्ड में वर्ष 89 -90 में विकास खंड अधिकारी के पद में था तब  उपलब्ध होने पर उसके ही आधार से  सम्बंधित गाव के लोगो से ही बात करने का नतीजा  है। 

 जादूटोने का प्रशिक्षण  (traning in witch craft )-


 कहा  जाता है की ये टोना जानने वाले मरने से पहले किसी न किसी अन्य युवा  आदमी या औरत  को ट्रेनिंग  देकर  अपनी विद्या सीखा जाते है।ऐसा भी विश्वास किया जाता है की ये टोनहिन कुछ अशरीरी शक्तियों को अपने कंट्रोल में रखते है। जैसे की वीर मसान  जो को जमीन  में गड़े हुए मुर्दो को   अपने  वश में किये जाते है। और यह इनके ट्रेनिंग का हिस्सा है।नौसिखिए  को  नग्न ही उनके ट्रेनर 21  रात्रि को ताज़ा गड़े मुर्दो की कब्र  और शमशान घाट की परिक्रमा करने भेजते है। वे स्वयं छुपे हुए इनपर नज़र रखते है।  जब इनकी आदत बन जाती है और ये भयभीत  होकर भाग खड़े नही हुए  तथा प्रमाणित कर दिए की वे ऐसी जगह में अकेले जाने में सक्छम है  तो    इनसे भूत प्रेत का आह्वान कराया जाता है। साथ ही इन्हे मंत्रसाधित पीली हल्दी से सनी चावल भी दी जाती है ,जिसके  फेकने से बुरी शक्तिया इनसे दूर रहती है।फिर इनके ट्रेनिंग का दूसरा पार्ट जिसमे एक जाति  विशेष  के कुंवारे  मृत व्यक्ती की खोपड़ी में चावल पका कर खाना है। ताकि वह उसके लिए वीर मसान बन सके। इस पूरी ट्रेनिंग के दौरान वे  पूर्णतः नग्न रहते है। सूत के एक धागा भी धारण नही करते है। और इस कंडीशन में जब वे घर से  बाहर  निकलते है। तो पुरे घर के सभी सदस्य को कुछ नशीली पदार्थ खिला पिला जाते है ताकि वे सोये ही रहे और उनका राज़ राज़ ही रहे कोई  दीगर न जाने। क्युकी ये घर से ही नग्न निकलते है और वैसे ही वापस आते है। मतलब की  यह भी   माना  जाता है  है कि   टोनही आधी रात को निर्वस्त्र होकर अपने घर से मात्र  एक  दिया लेकर  श्मशान घाट की ओर पैदल चली जाती है। और वहां उसके जैसे ही अनेक  महिलाये मिलकरतंत्र साधना करती  है। जनश्रुतियों के मुताबिक देर रात घर से दूर श्मशान में  पहुचने के बाद  मल का दीपक बनाती है। उस दिए में बाती लगाकर मुत्र व  तेल भरकर बिना माचिस के ही प्राकृतिक तरीके से  आग जला देती है। छत्तीसगढ़ की ज्यादातर लोक कथाओं में टोनही के बाल खोल कर झूमने -  झूपने का वर्णन मिलता है। कुछ लोगो के कथनानुसार   टोनही को पीपल ,डुमर  आदि के के पेड़ के नीचे बैठकर अमावस्या की रात 12 बजे से बाल खोलकर सर हिला-हिला कर तंत्र  साधना करते हुए भी बताया जाता  है।माना जाता है कि इस तंत्रसाधना के  दौरान उसके भीतर पृथ्वी की तमाम बुरी शक्तियों का प्रभाव आ जाता है। तांत्रिकों का भी दावा हैं की इस साधना के दौरान उसे कोई भी प्रभावित नहीं कर सकता। तंत्र मंत्र के जानकार बताते है कि काला जादू की शक्ति इतनी प्रभावशाली होती है कि टोनही आसपास मौजूद किसी भी  को  महसूस कर लेती है। ऐसा भी कहा जाता है कि टोनही को साधना करते हुए अगर किसी व्यक्ति ने देख लिया तो उसकी मौत हो जाती है। या गंभीर रूप से बीमार हो जाता है। स्वाभाविक है इस तरह के दृश्य देख कर कमज़ोर दिल वाले तो सदमे से ही मर जावेंगे ,थोड़ा मज़बूत होगा तो  भी भय से बीमार हो  ही जायेगा। 


 हरेली त्योहार

आम धारणा हैं की आषाढ़ माह की अमावस्या को हरेली त्योहार के दिन  टोनही की तंत्र साधना होती है। इस दिन को छत्तीसगढ़  प्रदेश में हरेली त्योहार के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। और स्थानीय लोग उस दिन जादू टोना  की भय से  यात्रा करना पसंद नही करते है। या शाम के बाद घर से बहार निकलना पसंद नही करते।यह दिन बैगाओं से लेकर जादू टोना करने वालों के लिए सबसे अच्छा दिन  माना  जाता है ऐसे कहा जाता है क़ि   ये उस समय दीखते नही सिर्फ इनकी मुह से गिरती लार जो की जलती हुई रहती है ही बाहर के लोगो को दीखता है। लोकमान्यता है की इस अवस्था में इन्हे देखने वाला मर भी सकता है। ये  भटकटइया  (.... )  के जड़ो को चबा चबा कर चूसते है। और इसमें फॉस्फोरस जैसे कुछ पदार्थ भी मिलाते है जो  की हवा के संपर्क में आकर  जलता है।कथाओ के मुताबिक टोनही की पहचान उसकी जीभ के नीचे जलने जैसी   काले रंग के मौजूद निशान से होती है।


 लेकिन मेरे एक मित्र के अनुसार कुछ औरतो में जो की एक प्रकार के नशे के आदि होते है ,के उस नशे के पदार्थ के कारण  ही वे निशान  होते है। और इसी जड़ी बूटी जो की लार के साथ इनके मुह से गिरती है वही  अग्नि जैसी  ज्योति भी पैदा करती है। जिसे भी दूर से रात के अँधेरे में देख लोग भयभीत हो जाते है। बैगाओं या जानकार  की माने तो यह निशान उनके कुछ और जड़ी बूटी के  तंत्र साधना के दौरान सेवन के  कारण  बनता है।  टोना करने वाले अपने  तेज नज़र व  अंदर तक वेधति  हुई  आँखों (sharp penetrating eyes )  से भी  पहचाने जा सकते है। लेकिन यह आवश्यक नही है।यह दिन बैगाओं से लेकर जादू टोना करने वालों के लिए सबसे अच्छा दिन  माना  जाता है। तांत्रिकों का ये  भी दावा हैं की इस साधना के दौरा उसे कोई भी प्रभावित नहीं कर सकता।

जन साधारण में  टोनही या डायन  का अंधविश्वास 

लोग माने या नही माने किन्तु यह सत्य ही है की  अंधविश्वास के चलते टोनही ,डायन या प्रेतीन , का नाम आज भी  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में भय पैदा कर देने के लिए पर्याप्त है।  सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं शहरी इलाकों में भी टोना-टोटका को लेकर आम लोगों के मन में संशय बना रहता है।  इस कथित काला जादू को लेकर टोना टोटका और टोनही जैसे संवेदनशील मुद्दे आज भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों मे  अपना प्रभाव रखती है। और इससे बचने के उपाय आम जन आज भी  करते ही नज़र आते  है।   


टोनही कौन बनती है और पहचान 

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में लोगों की धारणा है कि आम लोगों की तरह गांव में रहने वाली ऐसी महिलाएं ही टोनही बनती हैं, जिनके बच्चे नहीं होते हैं।समाज से कटे होते है ,घर परिवार में उपेक्षित रहते है।  कई लोग ऐसी महिलाओं को डायन के नाम से भी पुकारते हैं। अपना  प्रदेश ही नहीं बिहार,झारखण्ड, ओड़ीसा  और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में आज भी विधवा और अकेली उपेक्षित  गरीब  औरतें इसका दंश झेल रही हैं।   हमारे ग्रामीण इलाकों में टोनही के बारे में मत है कि वे नदी किनारे  चटिया-मटिया नाम के भूत को बुलाती है। इनके माध्यम से टोनही जिसे चाहे उसे अपने वश में कर सकती है और मर्जी के मुताबिक काम भी ले सकती है। 

बचाव के  रास्ते  :-- हरेली के दिन ऐसी मान्यता है कि बैगा ,ओझा और तंत्र मंत्र के जानकारों द्वारा घर में   सिद्ध नीम की टहनी बांध लेने से जादू टोने  का प्रभाव घर में नहीं आता है। हरेली के दिन गांव में हर किसी के दरवाजे पर नीम की टहनियां लटकते हुए देखा जा सकता है। गाव के  घरों की दीवारों पर गोबर से एक विशेष प्रकार का चिन्ह (चित्र ) बनाया जाता है। घर-आंगन को गाय के गोबर से लीपा जाता है। ताकि  टोना का प्रभाव बेअसर हो जावे ।

 ग्रामीण क्षेत्रों में टोनही के नाम पर प्राय:उल्लू ऑर काली बिल्ली  भी इनके काम में मदद करते है। और लोगो के  घर के ऊपर  में ही रात को आवाज़ लगा कर भय पैदा करते है। शायद ये चूहे खाने मकान  के छत पर जाते है।  भूत का अस्तित्व है या नही इस पर उस विषय के विशेषज्ञ विचार करेंगे पर यह कडवा सच है कि भूत, प्रेत  शब्द सुनते ही हम डर जाते है और उन स्थानो में जाने से  परहेज करते है जहाँ इनकी उपस्थिति बतायी जाती है। यदि सही  मे भूत केविश्वास को यदि इस दृष्टिकोण से देखे कि हमारे जानकार पूर्वजो ने कुछ जगह के  दोषो की बात को जानते हुये उससे भूत को जोड दिया हो ताकि आम जन उससे दूर रहे। इस  जगह में न जाये। और किसी भी तरह की दुर्घटना के शिकार न हो जावे। 

अंधविश्वास का दुष्परिणाम - उन औरतों को जुल्म झेलना पड़ता है जो विधवा हैं और अकेले रहती हैं। उनकी जायदाद हड़पने या रेप करने की बदनीयत से अनर्गल आरोप लगाकर परेशान किया जाता है। कभी निर्वस्त्र कर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है तो कभी गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। ताकि उनकी मकान और अन्य  संपत्ति हड़पी जा सके।  

टोनही निवारण कानून 2005 -  छत्तीससगढ़ राज्य में शासन ने टोनही जैसी सामाजिक बुराइयो से  से निपटने के लिए इसके खिलाफ 2005 में टोनही निवारण कानून बनाया है। इस कानून के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति  किसी महिला को टोनही बताकर प्रताड़ित करता है  वाले व्यक्ति को पांच से 10 साल तक की सजा हो सकती है और हत्या करने पर धारा 304 के तहत मुकदमा भी चलाया जाता है। इसके बाद भी टोनही के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाना बदस्तूर जारी है।

 अंत में यह तो एक आम धारना जो की अन्धविश्वास पर आधारित और  मनगढंत ही है। इसके प्रत्यक्चदर्शी आज तक कोई भी नही है  जो की इसे प्रमाणित कर सके। ये सिर्फ कमजोर ,नासमझ बुद्धि वाले ही है जो की इस सुनी सुनाई बातो पर  विश्वास कर समाज के  निरपराध लोगो को नुकसान पहुचाने का कार्य करते है। हमे इसके लिए लोगो को जागरूक करने  जन जागरण करने की आवश्यकता आज भी है। ताकि इसके नाम से हो रहे प्रतारणा को रोक जा सके। मेरे अगले पार्ट में छत्तीसगढ़ के मान्यता के अनुसार भूत प्रेत ..... सम्बन्धी अन्य जानकारी। यदि आपको यह पार्ट पसंद आया हो तो कमेंट जरूर करे। ( इस लेख के किसी भी पार्ट के उपयोग से पूर्व मेरी  अनुमति  प्राप्त करना आवश्यक होगा ) देवेन्द्रकुमारशर्मा रायपुर,छत्तीसगढ़

Monday, 26 January 2015

 सर्कस का जादू क्या आज भी कायम है ... ?
देवेंद्रकुमारशर्मा ११३ सुन्दर नगर रायपुर 

मित्रो आज गूगल बाबा ही हमारे  दादा, नाना दादी नानी है। जिनसे ही आज सारी  बाते मालूम हो पाति है।  आज  कंप्यूटर युग  है   और हर चीज झटपट माउस के एक क्लिक पर उपलब्ध है, तब भी किसी भी रंगारंग कार्यक्रम को  सीधे ही सामने बैठकर  और एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज कारनामे देखने का मजा ही कुछ और है।  फिर वो डांस का प्रोग्राम हो चाहे सिनेमा सर्कस ही क्यों न हो।
 सर्कस का नाम पढ़ते ही हमारे दिमाग में शेर-चीते-भालू के खेल से सजा शानदार टैंट में चल रहा खेल-तमाशा का  ध्यान आता है।और साथ में अगर हाथी, ऊंट, तोते, चिडियां और कुत्ते भी खेल दिखाने लगें तो आंखें आश्चर्य से खुली की खुली रह जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हो कि कभी भारतीय लोगों के मनोरंजन का फिल्म के बाद सबसे लोकप्रिय माध्यम सर्कस अब करीब-करीब बिन जानवरों का खेल दिखाता है? आजकल भी देश में कहि न कहि  सर्कस चल भी रहा है। यह तो  इन सर्कस चलाने वालों की हिम्मत ही है ,कि वह इस प्राचीन कला के माध्यम को हर तरह की परेशानी के बाद भी जीवित रखे हुए हैं।

‘द ग्रेट बॉम्बे सर्कस’ के मालिक संजीव और दिलीप नाथ का कहना है की , ‘सर्कस चलाना बहुत ही  मेहनत का काम है। एक सर्कस में 200 से ज्यादा लोग काम करते हैं। सबके रहने-सहने और खानपान की जिम्मेदारी सर्कस कंपनी की होती है। सभी कलाकार नहीं होते। पर वे एक-दूसरे से ऐसे जुड़े होते हैं, जैसे मोतियों की माला। कुछ का काम होता है तंबू लगाना, उखाड़ना व उनकी देखभाल करना, प्रचार प्रसार करना, तो कुछ लोग जानवरों की सेवा में लगे रहते हैं।
 खेल दिखाने वाले कलाकार तो होते ही हैं, परंतु उन्हें कब और क्या चाहिए और कई बार जब उनका शो खराब हो रहा होता है, तो कैसे जोकर व अन्य लोग उस शो को संभाल लेते हैं, यह देखते ही बनता है।’और जो की काबिलेतारीफ ही है।

भारत में सर्कस का प्रारम्भ 

 यदि कहा  जाये तो भारत में सर्कस के आदिगुरु होने का श्रेय  महाराष्ट्र के श्री विष्णुपंत छत्रे को है। वह कुर्दूवडी रियासत में घोड़े की देखभाल की   करते थे। उनका काम था घोड़े पर करतब दिखाकर राजा को प्रसन्न करना। 1879 में वह अपने राजा जी के साथ मुंबई में ‘रॉयल इटैलियन सर्कस’ में खेल देखने गए। वह पर  उसके मालिक ने भारतीयों का मजाक उड़ाते हुए कह दिया कि सर्कस में खेल दिखाना भारतीयों के बस की बात नहीं है। और  इस अपमान को छत्रे सह नहीं सके और उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक साल के भीतर ही भारत की पहली सर्कस कंपनी ‘द ग्रेट इंडियन सर्कस’ की नींव रखी और खेल दिखाना  चालू किया  । बाद में उनका साथ देने  केरल के कीलेरी कुन्नीकानन भी उनसे जुड़ गए । वह भारतीय मार्शल आर्ट ‘कालारी पायटू’ के मास्टर थे। उन्होंने सर्कस के कलाकारों को ट्रेनिंग देने के लिए स्कूल खोला। बाद में जितने भी सर्कस भारत में शुरू हुए, उनके अधिकतर मालिक इसी स्कूल से सीखकर विशेष रूप से  सर्कस जगत में आए। इसीलिए ही उन्हें भारतीय सर्कस का पितामह माना जाता है। भारत के मशहूर सर्कसों में ग्रेट रॉयल सर्कस (1909), ग्रैंड बॉम्बे सर्कस 1920 (यही सर्कस आज ‘द ग्रेट बॉम्बे सर्कस’ के नाम से जाना जाता है), ग्रेट रेमन सर्कस 1920, अमर सर्कस 1920, जेमिनी सर्कस 1951, राजकमल सर्कस 1958 और जम्बो सर्कस 1977 हैं।कमला सर्कस जो की एक जहाज दुर्घटना में डूब गया ,देश के आलावा दूसरे देश में भी अपना प्रदर्शन करता था।

 सर्कस की शुरुआत कैसे और क्यों हुई …?

प्राचीन रोम में भी सर्कस होने का प्रमाण मिलता है । बाद में जिप्सियों ने इस खेल को यूरोप तक पहुंचाया। इंग्लैंड में फिलिप एशले ने पहली बार लंदन में 9 जनवरी 1768 को सर्कस का शो दिखाया था। उसने घोड़ों के साथ कुत्तों के खेल को भी सर्कस में स्थान दिया। पहली बार दर्शकों को हंसाने के लिए उसने सर्कस में जोकर को जोड़ा। इंग्लैंड के जॉन बिल रिकेट्स अमेरिका में 3 अप्रैल 1793 को अपना दल लेकर पहुंचे और वहां के लोगों को सर्कस का अद्भुत खेल दिखाया। रूस के सर्कस बहुत अच्छे माने जाते हैं और वहां 1927 में मास्को सर्कस स्कूल की स्थापना हुई।
सर्कस और जानवर
प्राचीन काल से ही सर्कस से जानवर जुड़े हैं। इनके खेल दर्शक सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। परंतु सर्कस की कठिन दिनचर्या और ट्रेनिंग जानवरों के लिए बड़ी तकलीफदेह होती है। इसी को लेकर सर्कस में जानवरों के प्रदर्शन पर विरोध होने लगा और पेटा सहित अन्य संगठनों के प्रदर्शन के बाद कई देशों में जानवरों के सर्कस में प्रयोग पर पाबंदी लगने लगी। 1990 में भारत में सुप्रीम कोर्ट ने सर्कस में जंगली जानवरों के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। तब से कुछ ही जानवर सर्कस में प्रयोग होते हैं और उन्हें भी बैन करने की मुहिम चलाई जा रही है। ग्रीस पहला यूरोपियन देश है, जिसने सर्कस में किसी भी जानवर का उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाया है।

जोकर की जिंदगी
 यदि आपने मेरा नाम जोकर फिल्म  देखा होगा तो जोकर के काले सफ़ेद सरे पक्क्ष्  से आप परिचित होंगे।

सर्कस में सबसे ज्यादा तालियां बजती हैं  तो जोकरों के लिए ही । खासकर बच्चे इनका इंतजार करते रहते हैं कि ये कब मंच पर आएंगे। रंग-बिरंगे चेहरे, नकली नाक व बाल लगाकर सबको हंसाने वाले जोकर दो प्रोग्राम के बीच के टाइम में फिलर का काम करते हैं। इस समय में वो सबको खूब हंसाते हैं। कई लोगों की नकल करके, जोक सुनाके वे ऐसा करते हैं। कई बार तो इनके भी अलग कार्यक्रम होते हैं। आमतौर पर जोकर वे बनते हैं, जो शारीरिक विकास में पिछड़ जाते हैं और कद कम रह जाता है। बच्चों जैसे दिखने वाले ये जोकर कई बार साठ-साठ साल की उम्र तक के होते हैं। कई जोकर आम इनसान जितने भी होते हैं, पर तालियां तो छोटे कद वाले जोकर ही बटोर ले जाते हैं। इनका काम भी काफी मेहनतभरा होता है। शो के बाद ये काफी थक जाते हैं।

सर्कस पर किताबें
यूं तो सर्कस पर बहुत किताबें लिखी गई हैं, लेकिन अगर तुम्हें मौका मिले तो एनिड ब्लाइटन की सर्कस सीरीज पर लिखी तीन किताबों को जरूर पढिम्एगा। ये हैं-‘मि. गिलियानोज सर्कस’, ‘हुर्राह फॉर द सर्कस’ और ‘सर्कस डेज एगेन’। हिंदी में संजीव का उपन्यास ‘सर्कस’ पढ़ सकते हैं। सर्कस में ट्रेनर रहे दामू धोत्रे की आत्मकथा वाली पुस्तक भी बहुत अच्छी है।
सर्कस एक नजर में

सर्कस शब्द सर्कल शब्द से बना है, जिसका अर्थ है घेरा।
दुनिया का सबसे पुराना सर्कस प्राचीन रोम में था। आज से करीब 2500 वर्ष पहले बने इस सर्कस का नाम था—‘मैक्सिमम’।
भारत का पहला अपना सर्कस था—‘द ग्रेट इंडियन सर्कस’। इसका पहला शो मुंबई में 20 मार्च 1880 को हुआ था।
तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि अमेरिका के द रिंगलिंग ब्रदर्स एंड बार्नम एंड बैले सर्कस को दुनिया का सबसे बड़ा सर्कस माना जाता है। इस सर्कस को एक जगह से दूसरी जगह शो करने जाने के लिए दो पूरी ट्रेनों का उपयोग किया जाता है। इसके बेड़े में 100 से ज्यादा हाथी और कई अन्य तरह के जानवर शामिल हैं।
क्या आप भी सर्कस को बार बार देख कर उसे प्रोत्साहित नही  करना चाहेंगे ,....?




Thursday, 8 January 2015

तुरतुरिया , कसडोल , माता सीता का आश्रय स्थल

देवेन्द्र कुमार शर्मा ,सुंदरनगर ,रायपुर

मुझे इस स्थल में अनेको बार जाने का मौका मिला है।  सर्वप्रथम  यहा  पर  मै  अपने  मित्र श्री नारद चौधरी जी के साथ उनके बुलेट से सिरपुर और बार नयापारा  शासकीय यात्रा  के दौरान पंहुचा हु। उस समय मुझे याद है  हमदोनो के रायपुर से  महासमुंद  और वहां  से  सिरपुर  होते हुए कसडोल जाते समय रास्ते के   पुल - पुलियो में   तेज वर्षा की वजह से बाढ़  आ गए थे,और  हम दोनों को सिरपुर  केपुरानेविश्रामगृह में हि  रात व्यतीत  करना पड़ा  था। आज छत्तीसगढ़ का नाम  पुरातात्विक सम्पदा  से भरपूर  सिरपुर आदि के कारण  भारत  में ही नही बल्कि  विश्व मे भी अपनी एक अलग   स्थान  बनाता  जा  रहा  है।और सुबेरे मौसम खुलने पर जैसे तैसे रास्ते में  रूककर  तुरतुरिआ  को  देखते हुए कसडोल पहुंचे थे। वैसे श्री चौधरी  कसडोल से  20 ,25  km  दूर  बया  के पास  सोनपुरी ग्राम   के  ही रहने वाले है ,किन्तु इस स्थल में वे  पहली बार मेरे साथ ही पहुंचे थे।
  वैसे  तुरतुरिया रायपुर जिलासे 84 किमी एवं बलौदाबाजार जिला से 29 किमी दूर कसडोल तहसील से १२ किमी दूर प०ह्०न्० ४ बोरसी से ५किमी दूर और् सिरपुर से आने पर   23 किमी की दूरी पर   घोर वन प्रदेश के अंतर्गत  स्थित है। तब तो  मार्ग कच्चे और   जंगल वाले थे।  अब  पक्के मार्ग बन चुके है।

  यह   स्थान आसपास के छेत्र  में   सुरसुरी गंगा के नाम से भी प्रसिद्ध है तथा  प्राकृतिक दृश्यो से भरा हुआ एक मनोरम जगह  है जो कि  चारो और  से जंगल पहाडियो से घिरा हुआ है। इसके  समीप ही छत्तीसगढ़  का प्रसिद्ध अभ्यारण बारनवापारा   भी स्थित है। यहा  पर  अनेको  प्रकार के  वन प्राणी  ,फ़्लोरा व् फौना मिलते है। वैसे  तुरतुरिया बहरिया नामक गांव के समीप बलभद्री नाले पर स्थित है। एक बार  जब हम लोग जीप से सुबेरे के  समय यह पहुंचे थे ,तो नाले के आसपास  गौर ,हिरण ,भालू आदि  वन प्राणी  भी हमे भी  देखने को मिले थे।  किवदंती  है कि त्रेतायुग मे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही पर था और यही जगह  लवकुश की भी जन्मस्थली थी।

  इस स्थल का नाम तुरतुरिया होने का कारण  शायद यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानो के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमे से उठने वाले बुलबुलो के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है।

 इसका इक जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड मे गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड मे यह जल गिरता है वहां पर एक गोमुख बना दिया गया है जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनो ओर दो प्राचीन पाषाण   प्रतिमाए किसी वीर की स्मृती में स्थापित है जिसमे  कि इक  हाथ में तलवार लेकर  सिंह  को   मारते हुए हुए खड़ाहै और दूसरी मूर्ति जानवर से लड़ाई करता हुआ  उसकी गर्दन को मरोड़ता  हुआ  है। यही पर  विष्णु जी की भी दो प्राचीन  मूर्तीया  है।   जिनमे से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति मे है तथा दूसरी प्रतिमा मे विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है।  इस स्थान पर शिवलिंग भी खुदाई  आदि में भी  मिलते रहते  है..  इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा मे बिखरे दिखते  है जिनमे कलात्मक खुदाई किया गया है। जिससे लगता है की यह स्थल पूर्व में विकसित रहा होगा।  इसके अतिरिक्त कुछ प्राचीन  शिलालेख और  कुछ प्राचीन बुध्द की प्रतिमाए भी यहां स्थापित है।  यह  स्थल  बौध्द, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित  संप्रदायो की कभी  मिलीजुली संस्कृति रही होगी ऐसा प्रतीत होता है । समीप  ही नारायणपुर , शिवरीनारायण वैष्णव व्  शैव  धर्म के  धार्मिक स्थल  व् सिरपुर  बौध्द संस्कृति का भी  केन्द्र रहा होगा। आध्यात्मिक व्  पुरातात्विक  ये  स्थल इस बात को बल भी देती है।  ऎसा माना जाता है कि यहां कभी महिला  बौध्द विहार भी  थे जिनमे बौध्द भिक्षुणियो का निवास था। समीप ही  सिरपुर के  होने के कारण यह माना जा सकता है की  कि यह स्थल कभी बौध्द संस्कृति का भी  केन्द्र रहा होगा। विशेषज्ञों ने  ऎसा अनुमान लगाया गया है कि यहां से प्राप्त प्रतिमाओ का समय 8-9 वी शताब्दी है। आज भी यहां स्त्री पुजारिनो की नियुक्ति होती है जो कि एक प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है।  यहां पूष माह मे तीन दिवसीय मेला लगता है जिसमे  बडी संख्या मे आसपास के ग्रामवासी आते है। धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटको को अपनी ओर खींचता रहता  है अक़्सर पिकनिक  मनाने भी लोग आते रहते  है।
माता सीता का आश्रय स्थल

 इस जगह  के विषय में कहा जाता है कि लंका विजय से वापस आने के बाद   श्रीराम द्वारा  माता सीता  को त्याग दिये जाने पर माता सीता  को   इसी स्थान पर वाल्मीकि  मुनि जी ने अपने आश्रम में  उन्हें आश्रय दिया  था। और उनके पुत्र  लव-कुश का भी जन्म यहीं पर हुआ   माना  जाता है ।  महर्षि वाल्मीकि को रामायण के रचियता भी माना जाता है. और इस लिए  यहहिन्दुओं की अपार श्रृद्धा व भावनाओं का केन्द्र भी माना जा सकता  है



पुरातात्विक महत्त्व
सन 1914 ई. में सर्वप्रथम  तत्कालीन अंग्रेज़ कमिश्नर एच.एम. लारी ने इस स्थल के इतिहास  को समझ  यहाँ पर पुरातात्विक खुदाई करवाई, जिसमें अनेक मंदिर और सदियों पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुयी थीं। यहाँ वर्तमान में  पर कई मंदिर बनते जा रहे  है। नज़दीक ही  एक धर्मशाला भी  बना हुआ है।
मातागढ़' नामक मंदिर
यहँ पर 'मातागढ़' नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है, जहाँ पर महाकाली विराजमान हैं। नदी के दूसरी तरफ़ एक ऊँची पहाडी है। इस मंदिर पर जाने के लिए पगडण्डी के साथ सीड़ियाँ भी बनी हुयी हैं।मातागढ़' नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है जहाँ पर महाकाली जी  स्थापित  हैं। मातागढ़ में कभी बलि प्रथा होने के कारण बंदरों की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन अब पिछले कई सालों यह बलि प्रथा बंद कर दी गई है। अब केवल सात्विक प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। लोक  मान्यता है कि मातागढ़ में एक स्थान पर वाल्मीकि आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में ही  जानकी कुटिया है,जहा ही  सीता जी रहती थी।
मैंने पाया की वर्तमान में यह पर मंदिर के आलावा अन्य सामान्य सुविधा  खाने -पीने की वस्तुये   मेला के समय को छोड़कर अनुप्लब्ध  ही रहता है। अतः आप आते है तो पूरी व्यस्था के साथ ही आवे। किन्तु यहाँ  पर आवै  तो गंदगी न फैलावे यह ध्यान में रखे  ।
 (चित्र  गूगल से साभार  व् अन्य ब्लॉगर के सहयोग से  )



Friday, 19 December 2014

" बटकी में बासी अउ चुरकी में नून - में गावत हों ददरिया तें हा कान धर के  सून "

देवेन्द्र कुमार शर्मा  113 त्रिमूर्तिचोक  सुंदरनगर रायपुर छत्तीसगढ़ 
छत्‍तीसगढ के द्वार प्राचीन  काल से लेकर  वर्तमान समय तक  हर आगंतुक के स्वागत के  लिए सदैव खुले रहे हैं । "अतिथि देवो भव" शायद इसी प्रदेश के लिए सही रूप में फिट बैठती है। रामायण  व् अन्य  धार्मिक ग्रंथो के अनुसार  वनवास काल में श्रीराम और पाण्‍डवों को  जहां दण्‍डकारण्‍य नें आश्रय दिया था ।  वहीं    देश के   विभाजन के पश्चात  बंगाल से आये शरणार्थियों को दण्‍डकारण्‍य योजना के अंतर्गत आश्रय दिया है।तो  निर्वासित तिब्बतियो को सरगुजा जिले के मैनपाट  ने  आश्रय दिया है। कुछ लोग  छत्‍तीसगढ के इस अतिथि  प्रेम को उसकी निर्बलता  समझ लेते है। किन्तु समझने वालों को इतना ही स्‍मरण कर लेना पर्याप्त  होगा कि कौरवों को पराजित करने वाली पाण्‍डवों की विजयवाहिनी को इसी प्रदेश में बब्रुवाहन एवं ताम्रध्‍वज के रूप में दो दो बार चुनौती का सामना करना पडा था ।और छत्तीसगढ़िया ही उन पर भरी पड़े थे।
"बटकी में बासी अउ चुरकी में नून "
‘ भारत वर्ष में छत्‍तीसगढ का एरिया  धान का कटोरा  कहा जाता है। इसके पीछे कारण  यह है की धान की जितनी  अधिक किस्में  छत्‍तीसगढ में पायी जाती है उतनी और कही  भी आपको नही मिलेगा।  भारत में पडे  1828 से 1908 तक पडे भीषण अकालों नें  ही हमारे छत्तीसगढ़ वासियो को   बासी और नून खिलाना सिखाया है। "बटकी में बासी अउ चुरकी में नून " गीत तो आपने सुना ही होगा न।  ,जो की  आगे  इस तरह है

" बटकी में बासी अउ चुरकी में नून - में हा  गावत हावो  ददरिया  तें  हा कान  धर के  सून "
हम छत्तीसगढ़िया बटकी(कांसे का पात्र) में बासी और चुरकी  में नून तो  खाते ही है। और यही तो हमारा जीवन है ।   क्‍योंकि धान से ही तो हमारे  छत्‍तीसगढ का जीवन है । धान पर आधारित  अनेको लोकगीत बने हुए है। अर्थात धान  हमारे  गीतों में भी रचा-बसा है।
"बतकी में बासी ,दोना में दही ,
पटवारी ल बलादे  , नापन  जाही। "
  हम पके चावल को छोटे पात्र (बटकी) में पानी में डुबो कर ‘बासी’ बनाते हैं और एक हांथ के चुटकी में नमक लेकर दोनों का स्‍वाद ले के खाते हैं। ‘बासी’ रात  में डुबाया भात (पका हुआ चाँवल )  और दिन में पानी में  डुबोया भात " बोरे " कहलाता है। ह  भाई यही आम ग्रामीण  छत्तीसगढ़ियों का  प्रिय भोजन है।

और यदि साथ में दही या मठा (माहि )हो। आम के अरक्का (आचार ) ,चटनी  हो। घर के बाडी में लगाये  कांदा (शकरकन्द )की या खेड़ा  की   भी भाजी खट्टी सब्‍जी या  लाल फुल वाले  अमारी के छोटे पौधे के कोमल-कोमल पत्‍तों या उसके फूल  से बनी खट्टी चटनी ,लाइबरी (धन की लाइ  फोड़कर उससे  बनी बड़ी ) बिजोरी ,पापड़ और प्याज़  भी  साथ में हो तो क्या बात है ?
छत्तीसगढ़ के लोकगीत :
छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों के आम बोल चल में भी मधुरता है।
 छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों में  है - सुआ गीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत आदि ।यहा  के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता।
 ददरिया :-

यह  छत्तीसगढ़  का  प्रेम गीत है, जिसमे  संवाद के माध्यम से दो पक्षो  में प्रेमी और प्रेमिका की आपसी  नोकझोक है। इस  को  बड़े उल्‍लास के साथ  धान के खेतों, खलिहानों में काम करते हुए ,डोंगरी व वनों के रास्तो  में गा , गा कर भाव विभोर हो जाते है।गाव खेड़ा में अचानक ही एक मर्द  अपनी  पहली पंक्ति में  गीतों में प्रश्न  बोलेगा  तुरंत ही लड़कियों में  से बड़े ही मनोरंजक  तरीके से  गीतों के माध्यम से प्रति उत्तर सुनाई पड़ेगा।यानि पहेली भी इसके माध्यम से पूछे  व् हल की जाती है ।
छिन छिन पानी ,छिन छिन  घाम ,,
घिन घिनहा बलाये ,बदन भइस आग.।
( कभी कभी पानी गिरने का पल है ,तो कभी कभी धुप  निकलने का ,और   ऐसे मौसम में कोई गन्दा है और  वो   बुलाये तो बदन में आग  तो  लगना   ही है।
अलग डार में फरे लकड़ियाँ ,
जओन ल चाटे तोर डोकरिया
नही बताही तो  हिलहि  कनिहा
(पहेली का उत्तर है मुनगा  ड्रमस्टिक )
इस नोकझोक के बीच ही   में कभी कभी  बांसुरी की मधुर तान के साथ साथ ही  ददरिया  गया जाता हैं । और या  बांस की मधुर धुन के साथ भी  गीत भी सुनाई पड़ते है । जिसे की बास  गीत के रूप में भी गाते  है।  राउत जाती के लोगो को सबसे ज्यादा पसंद की गीत  है।यद्यपि  कहि- कहि  मर्यादाओ की सीमा  भी लाँघ जाता है। किन्तु अगले ही चरण में वहीं, इसके साथ ही, मर्यादा का संतुलन भी   बनता हुआ  नजर आता है।
खड़े  मंझनिया निकल  पनिया ,
दंगनि बिध डोले तोर कनिहा।
(बीच दोपहरी   पानी भरने जा रही हो , तुम्हारी  कमर  तो बांस  के कमानी  जैसी डोल  रही है )
  इसकी  हर  एक  पंक्ति में  छत्‍तीसगढ के अल्हड़ पन की झलक है ,जो की  अपनी सादगी और फक्कड़ता ,व्यंग्य  को प्रदर्शित करने की एक सहज  माध्यम  है।
बाम्हन बैरागी ला  सुपा में दिए धान ,
ओकर पोथी के पढ़इया ल लेगे भगवान।
यदि यह  प्रियतम की प्रणयातुर होकर  प्रियतमा  को याद करते हुए सन्‍नाटे को  चीरती  हुई पुकार है। तो तत्कालीन  परिस्थति को बयां करने का सशक्त  माध्यम भी है ? 

किसी ने लास्ट वर्ल्ड वॉर के समय को ध्यान में रखते हुए गाया  था -
 गोला  रे गोला  ,चांदी  के रे  गोला
 गोला  गिरगे सदर में, कांपत  है  रे चोला ,
गा ,  दन  दनादन गिरत हवे  बम के गोला
 लागथे रे  नाही बांचे  अब  रे  चोला

सुआ गीत  :- " तरी नारी न ना  रे ,न न  सूआ  न ,तरी नारी  नाना   हो 
                       तारी  नारी नाना हो ,
                       जाने झनि सुनी पावे बीरसिंग  राजा हो 
                        झनि सुनी पावे ,बीरसिंग  राजा। 
                        खन्ढरी ल हरहि , अउ भूँसा  ल भरही गो तरी नारी                                                                                                 नाना  हो  । "

 नारी के जीवन की विसंगतिओ  को दर्शाने वाला करुण गीत है। विशेष रूप से  गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का हरे रंग का  तोता) और एक खम्भे में  कलश रखकर  उसपर  दीपक जलाकर  उसके चारो ओर गोलाकार वृत्त में एक लय  के साथ ताली बजा कर नाचती गाती  घूमती जाती हैं।

 जहां नारी सुअना (तोता) की तरह पारिवारिक पिंजरें में  बंधी हुई है।और अपनी तुलना पिंजरे में बंद तोते से करती है।  इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिले ,और तोते की भांति घूमे फिरे  ऐसी कामना करती है।इस सुआ  गीत में उनकी अपनी  व्यथा  झलकती है।
 तोते को जंगल ,पहाड़ में स्वछन्द  उड़ने वाला पवित्र  पक्छी  माना  जाता है। हिन्दू  इसमें भगवान का रूप देखते   है , इसलिए इसे  नही  मारते। और महिलाये इसके माध्यम से अपना सन्देश अपने पूर्व प्रेमी या माता पिता और भाई तक भेजना चाहती है।  गीत की पंक्तियों में   ऐसे ही बात  होती है।
 दीपावली के आगमन के  अवसर पर लोगो के घर - आंगन में जा कर ये   हरे रंग की साड़ी पहनी हुई  नाचती , गाती है। ग्रामवासी इसके बदले में उन्हें पैसे या अनाज़  भी देते है।
राऊत गीत :- नदी  तीर मा  बारी बखरी,,,,,,,,,,,,,,,हवओओओओ ,,फेर
                    खेत में लगाये धानजी ,,,,,,,,,,,,,हवओओओओ ,,,?
                     मोर गाव के रहवइया हा  चल दिस पाकिस्तान जी

 दिपावली केअवसर  में  हि   गोवर्धन पूजा के दिन  गौ  माता और अन्य खेती के काम में आने वाले जानवर को  सेवाई (गले में सुन्दर सा कौड़ियो और मोर पंख से सजा कर बना हुआ  हार नुमा  पटटा)  बांध कर ,व् उन्हें कांजी का भोजन कराकर ,फिर  उछलते ,कूदते हाथ में लाठी लेकर राऊत जाति के लोगो के द्वारा गाया जाने वाला  वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी भाग लेते है।  इसमें तुरंत ही   दोहे बनाए जातें  है।दल के ही एक के द्वारा उची आवाज़ में  दोहे (हाना ) पढता है

,और फिर सभी गीत को दुहराते हुए उसका उत्तर देते हुए जोर से होiiiiiiiii रे की आवाज़ निकालते  हुए   गीत को पूरा करते हुए , ,  ढपली , नगाड़े  ,मंजीरा और तुतरी के धुन में , गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास भी  करते जाते हुए   एक दूसरे की लाठी से लाठी टकराते है। इस समय इनके द्वारा पहने गए वस्त्र मोर पंख  कौड़िओ से सजे धजे और सर में पगड़ी बंधी हुई रहती  है।ये इसी ड्रेस में बाजे गाजे के  अपने सभी परिचितों और देवी देवता के द्वार तक जाते है।

 इनके गीत के  प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर  बदलते हुए परिवेश में  सामजिक/राजनीतिक विसंगतियों पर भी  कटाक्ष करते हुए होते  है। गीत के बोल और देसी  गाड़ा  बाजे की धुन, लोगो के पैरो  को थिरकने हेतु   मज़बूर  कर देते है।

 " नदी  तीर मा  बारी बखरी,,,,,,,,,,,,,,,हव ओओओओ ,,
  खेत में लगाये धान जी ,,,,,,,,,,,,,हव ओओओओ ,,,?
   मोर गाव के रहवइया ह  चल दिस पाकिस्तान जी।"
    होओओओ  धमर धमर धम  और नाच शुरू
(यहा  पाकिस्तान का तात्पर्य  उसके परिचित का गाव छोड़कर शहर   में जा  बसना है)
नाती पूत ले घर भर जावै ,जियो लाख बरिस।
धन गोदानी भुइया पावों ,पावो हमर आशीस
इस दोहे के माध्यम से वह आशीस भी दे रहा है की आपका घर नाती -पोते से आबाद रहे ,आप लाखो वर्ष जीते हुए धन गायों  ,भूमि सम्पत्तियो से  परिपूर्ण भी रहे। हमारा आशिस आपके साथ है। जिसे स्वीकार करो।

 होली  गीत :-- बसन्तोस्तव  के स्वागत में फाल्गुन माह में रंग और अबीर के साथ होली की त्यौहार मनाया जाता है। इस समय आदमी गन्दा और अश्लील बोलने की स्वंतत्रता महसूस करता है.और यह उनके गीतों में भी झलकता है।   गीतों के भी बोल द्विअर्थी हो जाते है।  जैसे -
 छोटे देवरा  मोर बारि  में लगा दे रे  केवरा
कौन जात  है आरी बारी
कौन जात  है फुलवारी
कौन जात  है भाटा  बारी
कौन है  रे जो मज़ा मारी
 छोटे देवरा  मोर बारि  में लगा दे रे केवरा
(इसमें केवड़ा  आरी बारी शब्द  संकेतात्मक है ) अगले  गीत की बानगी  देखिये।
" मोर मुरली बजाये ,मोर बंशी बजाये ,,
 छोटे से श्याम कन्हैया
 छोट छोट रुखवा कदम के
 भुइया लहसे डार
 जा तरी बैठे कृष्णा कन्हैया
 गला लिए लिपटाय
 छोटे से श्याम कन्हैय्या
 मुख मुरली बजाये ,मोर बंशी बजाये । "
(यहा  पर श्याम कन्हैय्या , मुरली और कदम के पेड़  सांकेतिक है )
भक्ति गीत पंथी गीत  करमा गीत के बारे में अगली बार देखिये 

  • Vijay Kumar Sahu BundeliAnand Deo Tamrakar और 2 और को यह पसंद है.
  • Prakash Kumar bore ya basi ko jab aap Seeta tooma (goal matki jaisa 
  • tuma jisme hum loag pahle garmi me pani rakhne k liye pryog karte the) me 
  • basi ko rakh kar khel le jate the aur khate the jo Zira chatni(Aamari k Fool) k 
  • sath behad swad aur sitalta pradan karta thi,
  • basi me fragmentation kriya hot hain jab use rat me pani dal k dubaya jata hain 
  • jisse basi fayede mand rahta hain, Gaon me to Foote chana ke sath khaya jata tha jo garib k liye swad aur nutrition ka kam karta tha, 

    Dadariya me aaj bhi Hamare gramin chhetro me has-parihar, khusi, utsah 
  • aapne priya k viyog aur prakriti se samband ko darsata hain jo dhan bote nidai 
  • kudai aur mainjai ke samay krisi karyo me bhi gaya jata hain " Chanda rani la 
  • Churee mangeo, Churee radi tutge vo Zillo tore khatir, Chanda Rani Gari dehi
  •  Bijali tore khatir" "Maya dede maya lele maru pirit bhaye ka vo,"..................
  • DK Sharma