Wednesday, 3 August 2016
Saturday, 16 July 2016
मृतात्मा मेरी ऊँगली में सवार. ,,,,,,,.. रुकने का नाम ही न ले ,मै पसीना पसीना (आपबीती )
,
---बात तब की है जबकि हमने इलेवन्थ का एग्जाम दिया था। रिजल्ट नही आये थे। मुहल्ले के और दोस्तों ने रामशलाका का उपयोग किया ।
लेकिन रिजल्ट गड़बड लग रहा था उन्हें। उन लोगो ने कहि सुना था की,मृतात्मा को बुलाने से वो सही सही बात बताती है।
मुझे भी शामिल कर एक बंद कमरे में पुराने कैलंडर के पीछे सफ़ेद भाग पर पर परकाल से गोल घेरा बनाकर स्केल की मदद से बीचो बीच सीधी लाइन खींचा गया।
जिसमे एक ओर यस २रे ओर नो लिखा गया। रात के 11 बज रहे थे। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। कहि दूर से क्भी कभी कुत्ते की भोकने कि आवाज वातावरण को और डरावना बना दे रही थी ।
दोस्तों का कहना था कि आत्मा को प्रकाश पसंद नही। बंद कर दिए गये लाइट। मोमबत्ती की प्रकाश कमरे को भयावह रूप दे रही थी। हमको अपना रिजल्ट जानना था सो बैठे रहे।
फिर शुरू हुआ आव्हान आत्मा के नाम से मृतकों के नाम लेकर बुलाने का सिलसिला ।
एक पुरानी शीशी के ढक्कन को बीचोबीच गोल घेरे मे रखा गया। फिर जिन के भी नाम याद आ रहे थे आमन्त्रित किया। एक नाम पर ऊँगली टस से मस ही नही हुई । हम चारो एक दूसरे के चेहरे को देखने लगे।
तभी एक ने कहा यार वो साला अभी ,तो जिन्दा है उसकी आत्मा कहा से आयेगी। और हम लोग हस पड़े ।
फिर मरे लोगो के नाम लेकर कन्फर्म किया. फिर शुरू हुआ आत्मा को आव्हान करने का कार्यक्रम।
एक आत्मा का नाम लेकर आने के लिए बोला गया कि हे श्री,,,, जी आप भूमि लोक में आकर हमारे कुछ प्रश्नो का जवाब दे ,मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही थीं।
मैने कहा पहले मेरा रिजल्ट बताओ।
दोस्त जिसकी ऊँगली ढक्कन के ऊपर थी। ने कहा , हे पवित्र आत्मा आप आ गए है तो प्रमाण देवे। अचानक मोमबत्ती की लौ तेज़ हो गई। और दोस्त की उँगली के नीचे का ढक्कन काँपते हुए यस लिखे की ओर चलकर फिर वापस अपनी जगह में आ गया।
दोस्त ने बोला की ये देवेन्द्र हमारे बीच है , इलेवन्थ मे पास होगा की नही।
ढक्कन नही हिला ,मैंने कहा हे पवित्र ,,,,,जी की आत्मा प्लीज़ बताइये न ये हमारे जीवन मरण का सवाल हैं।
फ़ैल होने पर बड़ा भाई पीटेगा ,व् घर वाले भी नाराज़ होंगे। प्लीज़ ,,प्लीज़। अचानक ढक्कन पहले गोल घेरे मे घूमने लगा। प्लीज़ मैंने फिर से निवेदन किया।
उंगली के नीचे ढक्कन नो की ओर जाने लगा। मेरी साँस तेज़ हो गयी। लगा की फेल हो जाऊंगा। नो को टच कर ढक्कन फिर घेरे में गोल- गोल घूमने लगा। और फिर अचानक यस की ओर चल पडा। ह,,,,,, गहरी साँस ली मैंने।
फिर वापस डगमग करते गोल घेरे और फिर एकबार यस में।
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। लेकिन एक बार नो में क्यू मैं सोचने लगा।
(इस में भी एक रहस्य था जिसे आगे कभी बताउंगा )
फिर उस आत्मा से छमा मांग उन्हें वापिस जाने का निवेदन किया गया।
अब दूसरे दोस्तों ने मुझे अपनी उंगली उस ढक्कन में रख उसके भविष्य पूछने बोला।
आधेघंटे बीत चूका था मोमबत्ती भी काफी जल चुकी थी। वातावरण भी रहस्य मय हो गया था। पता नही क्यू कुत्ते भी जोर जोर से भौक रहे थे ।
हम लोग सोच नही पा रहे थे की किसे बुलाए। तभी याद आया कि हाल हि में एक महिला नेत्री विमान दुर्घटना में मर गयी है। दोस्तों ने खुसुरपुसुर किया और उसके नाम पर तैय्यार हो गये।
मेरी उंगली ढक्कन पर उस गोल घेरे में रखा ही था की एक कुत्ता घर के ही बाहर ही आकर भोकने लगा , उसे पहले भगाया गया।
चूँकि मेरा रिजल्ट मृतात्मा ने घोषित कर हि दिया था ,खुश हो ऊँगली ढक्कन के ऊपर रख बैठ गया।
अब उस मृत मृतात्मा के नाम लेकर उन्हें अपने बीच आने का निमंत्रण दिया। ऊँगली हिली भी नही।
दोस्तों को लगा की जानबूझकर मैंने ठीक से आव्हान नही किया। क्यूंकि मेरा सवाल तो हल हो ही चूका था।
गम्भीरता से मैंने उनका नाम लेकर फिर आमंत्रित किया , आप आये व् हमारे जवाब देवे ।
तभी ढक्कन थोड़ा सा हिला ही था कि पता नही कहा से कुत्ता फिर आकर भोकने लगा मै डर गया।
एक दोस्त ने कुत्ते को फिर भगाया। दरवाज़ा खुलते ही हवा के झोके से मोमबत्ती बुझ गयी। फिर उसे जलाया गया। मैंने फिर शांत भाव से उस महिला मृतात्मा का नाम लेकर अपने बीच आने को निमंत्रित किया।
अचानक मेरी ऊँगली के नीचे के ढक्कन में कम्पन हुआ । हाथ जैसे मेरे अधिकार में नही रहे। गोल घेरे में ऊँगली ढक्कन सहित घूमने लगा .......,दोस्त के रिजल्ट से संबंधित सवाल किया , मेरे हाथ की उंगली कांपते हुए कभी यस कभी नो की ओर जाने लगी।
मोमबत्ती की लाइट फड़फड़ा रही थी। फिर सवाल दुहराया गया।
अचानक मेरी ऊँगली ढक्कन सहित गोल गोल घूमने लगा। रोकते भी नही रुक रहा था .
चेहरा मेरा पसीना से लथपथ। दोस्तों की भी चेहरे में हवाइयां साफ देखि जा सकती थी।
अचानक वो कुत्ता फिर कहि से आकर रोने लगा ।
कौन है रे क्या कर रहे हो ,दोस्त जिसके मकान में थे के दादा जी की आवाज़ आई और उनके डर से हाथ की ऊँगली ढक्कन के ऊपर से हटी। और डरते डरते हम लोग अपने घर की और भाग लिये।
फिर कभी नही प्लेनचिट में आत्मा नही बुलाया। क्यूंकि लगता था की उस महिला की मृतात्मा हम लोगो से बदला न ले ले । धन्यवा
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---बात तब की है जबकि हमने इलेवन्थ का एग्जाम दिया था। रिजल्ट नही आये थे। मुहल्ले के और दोस्तों ने रामशलाका का उपयोग किया ।
लेकिन रिजल्ट गड़बड लग रहा था उन्हें। उन लोगो ने कहि सुना था की,मृतात्मा को बुलाने से वो सही सही बात बताती है।
मुझे भी शामिल कर एक बंद कमरे में पुराने कैलंडर के पीछे सफ़ेद भाग पर पर परकाल से गोल घेरा बनाकर स्केल की मदद से बीचो बीच सीधी लाइन खींचा गया।
जिसमे एक ओर यस २रे ओर नो लिखा गया। रात के 11 बज रहे थे। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। कहि दूर से क्भी कभी कुत्ते की भोकने कि आवाज वातावरण को और डरावना बना दे रही थी ।
दोस्तों का कहना था कि आत्मा को प्रकाश पसंद नही। बंद कर दिए गये लाइट। मोमबत्ती की प्रकाश कमरे को भयावह रूप दे रही थी। हमको अपना रिजल्ट जानना था सो बैठे रहे।
फिर शुरू हुआ आव्हान आत्मा के नाम से मृतकों के नाम लेकर बुलाने का सिलसिला ।
एक पुरानी शीशी के ढक्कन को बीचोबीच गोल घेरे मे रखा गया। फिर जिन के भी नाम याद आ रहे थे आमन्त्रित किया। एक नाम पर ऊँगली टस से मस ही नही हुई । हम चारो एक दूसरे के चेहरे को देखने लगे।
तभी एक ने कहा यार वो साला अभी ,तो जिन्दा है उसकी आत्मा कहा से आयेगी। और हम लोग हस पड़े ।
फिर मरे लोगो के नाम लेकर कन्फर्म किया. फिर शुरू हुआ आत्मा को आव्हान करने का कार्यक्रम।
एक आत्मा का नाम लेकर आने के लिए बोला गया कि हे श्री,,,, जी आप भूमि लोक में आकर हमारे कुछ प्रश्नो का जवाब दे ,मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही थीं।
मैने कहा पहले मेरा रिजल्ट बताओ।
दोस्त जिसकी ऊँगली ढक्कन के ऊपर थी। ने कहा , हे पवित्र आत्मा आप आ गए है तो प्रमाण देवे। अचानक मोमबत्ती की लौ तेज़ हो गई। और दोस्त की उँगली के नीचे का ढक्कन काँपते हुए यस लिखे की ओर चलकर फिर वापस अपनी जगह में आ गया।
दोस्त ने बोला की ये देवेन्द्र हमारे बीच है , इलेवन्थ मे पास होगा की नही।
ढक्कन नही हिला ,मैंने कहा हे पवित्र ,,,,,जी की आत्मा प्लीज़ बताइये न ये हमारे जीवन मरण का सवाल हैं।
फ़ैल होने पर बड़ा भाई पीटेगा ,व् घर वाले भी नाराज़ होंगे। प्लीज़ ,,प्लीज़। अचानक ढक्कन पहले गोल घेरे मे घूमने लगा। प्लीज़ मैंने फिर से निवेदन किया।
उंगली के नीचे ढक्कन नो की ओर जाने लगा। मेरी साँस तेज़ हो गयी। लगा की फेल हो जाऊंगा। नो को टच कर ढक्कन फिर घेरे में गोल- गोल घूमने लगा। और फिर अचानक यस की ओर चल पडा। ह,,,,,, गहरी साँस ली मैंने।
फिर वापस डगमग करते गोल घेरे और फिर एकबार यस में।
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। लेकिन एक बार नो में क्यू मैं सोचने लगा।
(इस में भी एक रहस्य था जिसे आगे कभी बताउंगा )
फिर उस आत्मा से छमा मांग उन्हें वापिस जाने का निवेदन किया गया।
अब दूसरे दोस्तों ने मुझे अपनी उंगली उस ढक्कन में रख उसके भविष्य पूछने बोला।
आधेघंटे बीत चूका था मोमबत्ती भी काफी जल चुकी थी। वातावरण भी रहस्य मय हो गया था। पता नही क्यू कुत्ते भी जोर जोर से भौक रहे थे ।
हम लोग सोच नही पा रहे थे की किसे बुलाए। तभी याद आया कि हाल हि में एक महिला नेत्री विमान दुर्घटना में मर गयी है। दोस्तों ने खुसुरपुसुर किया और उसके नाम पर तैय्यार हो गये।
मेरी उंगली ढक्कन पर उस गोल घेरे में रखा ही था की एक कुत्ता घर के ही बाहर ही आकर भोकने लगा , उसे पहले भगाया गया।
चूँकि मेरा रिजल्ट मृतात्मा ने घोषित कर हि दिया था ,खुश हो ऊँगली ढक्कन के ऊपर रख बैठ गया।
अब उस मृत मृतात्मा के नाम लेकर उन्हें अपने बीच आने का निमंत्रण दिया। ऊँगली हिली भी नही।
दोस्तों को लगा की जानबूझकर मैंने ठीक से आव्हान नही किया। क्यूंकि मेरा सवाल तो हल हो ही चूका था।
गम्भीरता से मैंने उनका नाम लेकर फिर आमंत्रित किया , आप आये व् हमारे जवाब देवे ।
तभी ढक्कन थोड़ा सा हिला ही था कि पता नही कहा से कुत्ता फिर आकर भोकने लगा मै डर गया।
एक दोस्त ने कुत्ते को फिर भगाया। दरवाज़ा खुलते ही हवा के झोके से मोमबत्ती बुझ गयी। फिर उसे जलाया गया। मैंने फिर शांत भाव से उस महिला मृतात्मा का नाम लेकर अपने बीच आने को निमंत्रित किया।
अचानक मेरी ऊँगली के नीचे के ढक्कन में कम्पन हुआ । हाथ जैसे मेरे अधिकार में नही रहे। गोल घेरे में ऊँगली ढक्कन सहित घूमने लगा .......,दोस्त के रिजल्ट से संबंधित सवाल किया , मेरे हाथ की उंगली कांपते हुए कभी यस कभी नो की ओर जाने लगी।
मोमबत्ती की लाइट फड़फड़ा रही थी। फिर सवाल दुहराया गया।
अचानक मेरी ऊँगली ढक्कन सहित गोल गोल घूमने लगा। रोकते भी नही रुक रहा था .
चेहरा मेरा पसीना से लथपथ। दोस्तों की भी चेहरे में हवाइयां साफ देखि जा सकती थी।
अचानक वो कुत्ता फिर कहि से आकर रोने लगा ।
कौन है रे क्या कर रहे हो ,दोस्त जिसके मकान में थे के दादा जी की आवाज़ आई और उनके डर से हाथ की ऊँगली ढक्कन के ऊपर से हटी। और डरते डरते हम लोग अपने घर की और भाग लिये।
फिर कभी नही प्लेनचिट में आत्मा नही बुलाया। क्यूंकि लगता था की उस महिला की मृतात्मा हम लोगो से बदला न ले ले । धन्यवा
घनघोर जंगलो में प्राकृतिक गुफा के भीतर खुद बना है मंदीप गुफा में शिवलिंग, ठाकुरटोला गाव में जिसके साल में सिर्फ एक दिन एक नदी को 16 बार पार करने पर मिलते हैं दर्शन
आज से १० ,वर्ष पहले जब मैं खैरागढ़ राजनांदगांव में पदस्थ था। लोग गर्मी के दिनों में अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को जंगल के भीतर स्थित एक गुफा को देखने चलने की बात करते थे ।
जिसे लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। यह जगह छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में छुईखदान ब्लॉक में ठाकुरटोला गाव जो की गंडई से साल्हेवारा रोड के बीच में स्थित है।
इस जगह में घनघोर जंगलों के बीच प्राकृतिक गुफा के भीतर एक शिवलिंग स्थापित है। जिसे ही लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। निहायत ही निर्जन स्थान में गुफा के ढा़ई सौ मीटर अंदर उस शिवलिंग को किसने और कब स्थापित किया यह कोई नहीं जानता।
आस पास के ग्रामीणों के द्वारा कहा जाता है कि वहां बाबा स्वयं प्रकट हुए हैं। यानी शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हुआ है।जिसकी पूजा ठाकुरटोला के राजवंश के सदस्य व ग्रामवासी लोग ही वर्ष में एक बार करते है। अतः
यहां बाबा के दर्शन करने का मौका साल में एक ही दिन मिल सकता है। वो भी अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को।
दिलचस्प बात ये है कि वहां जाने के लिए एक ही नदी को 16 बार लांघना पड़ता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि वहां जाने का रास्ता ही इतना घुमावदार है कि वह नदी रास्ते में 16 बार आती है।
साल में एक ही बार जाने के पीछे पुरानी परंपरा के अलावा कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां भी हैं। बरसात में गुफा में पानी भर जाता है, और रास्ते भी काफी दुर्गम हो जाते है। जबकि ठंड के मौसम में खेती-किसानी में व्यस्त होने से लोग वहां नहीं जाते।
रास्ता भी इतना दुर्गम है कि सात-आठ किलोमीटर का सफर तय करने में करीब एक घंटा लग जाता है। उसके बाद पैदल चलते समय पहले पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना, तब जाकर गुफा का दरवाजा मिलता है।
साथ ही यह घोर नक्सल इलाके में पड़ता है, इसलिए भी आम दिनों में लोग इधर नहीं आते। साथ ही वन्य प्राणियों की भी मिलने की सम्भावना भी रहती है।
हर साल अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार के दिन गुफा के पास इलाके के हजारों लोग जुटते हैं।
परंपरानुसार सबसे पहले ठाकुर टोला राजवंश के लोग पूजा करने के बाद गुफा में प्रवेश करते हैं। उसके बाद आम दर्शनार्थियों को प्रवेश करने का मौका मिलता है। गुफा के डेढ़-दो फीट के रास्ते में घुप अंधेरा रहता है।
लोग काफी कठिनाई से रौशनी कीव्यवस्था साथ लेकर बाबा के दर्शन के लिए अंदर पहुंचते हैं।
गुफा में एक साथ 500-600 लोग प्रवेश कर जाते हैं। अभी १५ २० वर्ष पूर्व गुफा के अंदर मशाल के और बीड़ी की धुवा ने मधुमक्खीयो को उत्तेजित कर दिया था और उसने काफी लोगो को काट कर घायल कर दिया था। इसलिए अंदर काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
गुफा के अंदर जाने के बाद कई रास्ते खुलते है , इसलिए अनजान आदमी को गुफा के अंदर भटक जाने का डर बना रहता है। ऐसा होने के बाद शिवलिंग तक पहुंचने में चार-पांच घंटे का समय लग जाता है।
इसलिए ग्राम के उन व्यक्तिओ को जो प्रति वर्ष अंदर जाते रहते है लोगो के साथ झुण्ड में ही जाना उचित रहता है।
स्थानीय लोगो का का कहना है मैकल पर्वत पर स्थित इस गुफा का एक छोर अमरकंटक में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज तक कोई वहां तक नही पहुंच पाया है। लेकिन बहुत पहले पानी के रास्ते एक कुत्ता छोड़ा गया था, जो अमरकंटक में निकला। जबकि अमरकंटक यहां से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर है।
आज से १० ,वर्ष पहले जब मैं खैरागढ़ राजनांदगांव में पदस्थ था। लोग गर्मी के दिनों में अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को जंगल के भीतर स्थित एक गुफा को देखने चलने की बात करते थे ।
जिसे लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। यह जगह छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में छुईखदान ब्लॉक में ठाकुरटोला गाव जो की गंडई से साल्हेवारा रोड के बीच में स्थित है।
इस जगह में घनघोर जंगलों के बीच प्राकृतिक गुफा के भीतर एक शिवलिंग स्थापित है। जिसे ही लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। निहायत ही निर्जन स्थान में गुफा के ढा़ई सौ मीटर अंदर उस शिवलिंग को किसने और कब स्थापित किया यह कोई नहीं जानता।
आस पास के ग्रामीणों के द्वारा कहा जाता है कि वहां बाबा स्वयं प्रकट हुए हैं। यानी शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हुआ है।जिसकी पूजा ठाकुरटोला के राजवंश के सदस्य व ग्रामवासी लोग ही वर्ष में एक बार करते है। अतः
यहां बाबा के दर्शन करने का मौका साल में एक ही दिन मिल सकता है। वो भी अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को।
दिलचस्प बात ये है कि वहां जाने के लिए एक ही नदी को 16 बार लांघना पड़ता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि वहां जाने का रास्ता ही इतना घुमावदार है कि वह नदी रास्ते में 16 बार आती है।
साल में एक ही बार जाने के पीछे पुरानी परंपरा के अलावा कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां भी हैं। बरसात में गुफा में पानी भर जाता है, और रास्ते भी काफी दुर्गम हो जाते है। जबकि ठंड के मौसम में खेती-किसानी में व्यस्त होने से लोग वहां नहीं जाते।
रास्ता भी इतना दुर्गम है कि सात-आठ किलोमीटर का सफर तय करने में करीब एक घंटा लग जाता है। उसके बाद पैदल चलते समय पहले पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना, तब जाकर गुफा का दरवाजा मिलता है।
साथ ही यह घोर नक्सल इलाके में पड़ता है, इसलिए भी आम दिनों में लोग इधर नहीं आते। साथ ही वन्य प्राणियों की भी मिलने की सम्भावना भी रहती है।
परंपरानुसार सबसे पहले ठाकुर टोला राजवंश के लोग पूजा करने के बाद गुफा में प्रवेश करते हैं। उसके बाद आम दर्शनार्थियों को प्रवेश करने का मौका मिलता है। गुफा के डेढ़-दो फीट के रास्ते में घुप अंधेरा रहता है।
लोग काफी कठिनाई से रौशनी कीव्यवस्था साथ लेकर बाबा के दर्शन के लिए अंदर पहुंचते हैं।
गुफा में एक साथ 500-600 लोग प्रवेश कर जाते हैं। अभी १५ २० वर्ष पूर्व गुफा के अंदर मशाल के और बीड़ी की धुवा ने मधुमक्खीयो को उत्तेजित कर दिया था और उसने काफी लोगो को काट कर घायल कर दिया था। इसलिए अंदर काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
गुफा के अंदर जाने के बाद कई रास्ते खुलते है , इसलिए अनजान आदमी को गुफा के अंदर भटक जाने का डर बना रहता है। ऐसा होने के बाद शिवलिंग तक पहुंचने में चार-पांच घंटे का समय लग जाता है।
इसलिए ग्राम के उन व्यक्तिओ को जो प्रति वर्ष अंदर जाते रहते है लोगो के साथ झुण्ड में ही जाना उचित रहता है।
Wednesday, 6 July 2016
स्थानांणतरण नहीं हो रहा हो तो मुक्तागिरी के दर्शन करो ...?
बैतूल - मेरे पसंदीदा शहर में से एक .. डी. के. शर्मा
वर्ष 2000 में अचानक ही मुझे बैतूल जिला में पदस्थ किया गया। बैतूल सतपुड़ा की वादियों में मध्य प्रदेश का एक जिला है जो की इटारसी नागपुर के मध्य स्थित है। समीप ही स्थित रेल्वे स्टेशन बरसाली भारत के केंद्र बिंदु है। इस जिले की खास बात है कि ये देश के बिल्कुल केंद्र में बसा है।
बैतूल शहर तीन हिस्सों में बंटा है। मेरा कार्यालय बस स्टैंड के पास ही था तो मैंने समीप के एक लॉज में ही रहना प्रारम्भ कर दिया क्युकी समीप ही भोजनालय और पिक्चर हॉल भी था। साथ ही बैतूल के बस स्टैंड में कही भी जाने को बस मिल जाती थी। रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए सस्ते मे तांगा और आसपास में अच्छा बाजार भी है ।
जैसे की पहले मैंने बताया बैतूल शहर तीन हिस्सों में बंटा है। बैतूल बाजार, बैतूल गंज( रेलवे स्टेशन के पास का इलाका) और बैतूल कोठी बाजार। कोठी बाजार बस स्टैंड के पास का इलाका का नाम है। रेलवे स्टेशन के तरफ कल्लू ढाना और भग्गू ढाना आदि , आदि।
बैतूल से 45 किलोमीटर आगे मुलताई में ताप्ती नदी का उदगम स्थल है।जिसकी भी मान्यता नर्मदा जी की ही जैसी है ,और यह नर्मदा की एक सहायक नदियों में से एक है।धार्मिक मान्यता के अनुसार मा ताप्ती सूर्यपुत्री और शनि की बहन के रुप में जानी जाती है । यही कारण है कि जो लोग शनि से परेशान होते है उन्हे ताप्ती से राहत मिलती है । ताप्ती सभी की ताप कष्ट हर उसे जीवन दायनी शकित प्रदान करती है श्रद्धा से इसे ताप्ती गंगा भी कहते है । दिवंगत व्यकितयों की असिथयों का विसर्जन भी ताप्ती में करते है । म.प्र. की दूसरी प्रमुख नदी है । इस नदी का धार्मिक ही नही आर्थिक सामाजिक महत्व भी है । सदियों से अनेक सभ्यताएं यहां पनपी और विकसित हुर्इ है । इस नदी की लंबार्इ 724 किलोमीटर है । यह नदी पूर्व से पशिचम की और बहती है इस नदी के किनारे बुरहानपुर और सूरत जैसे नगर बसे है । ताप्ती अरब सागर में खम्बात की खाडी में गिरती है ।
बैतूल में बने बालाजीपुरम मंदिर को देश का पांचवा धाम कहा जा रहा है। बालाजीपुरम बैतूल रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर नागपुर हाईवे पर है । और बस स्टैंड से 10 किलोमीटर है। हर थोड़ी देर पर बालाजीपुरम के लिए बस स्टैंड से टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां मिलती हैं। मैंने इस मंदिर का निर्माण होते देखा है। बालाजी मंदिर पुराने नागपुर रोड पर है।बालाजीपुरम भगवान बालाजी का विशाल मंदिर के लिये प्रसिद्ध है। यह स्थान बैतूल बाजार नगर पंचायत के अन्तर्गत आता है। जिला मुख्यालय बैतूल से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 69 पर सिथत है। दिन प्रतिदिन इसकी प्रसिद्धि फैलती जा रही है। यही कारण है कभी भी किसी भी मौसम में आप इसमें जाएं श्रद्धालुओं का ताता लगा रहा है। मंदिर के साथ ही चित्रकुट भी बना है। जिसमें भगवान राम के जीवन से जुड़े विविध प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया है। मूर्तियां ऐसे बनी है जैसे बोल पडे़ं मंदिर के पीछे से फोर लेन हाईवे गुजर रहा है।
शहर के समीप ही सोनाडीह स्थित हनुमान का मंदिर ऊपर टेकरी पर है। जो की पिकनिक के लिए अच्छी जगह है।
सामान्य तौर में भोपाल के दिशा से से बैतूल आने वाली ट्रैन समय से पहली ही आ जाती है। ,
बैतूल का रेलवे स्टेशन काफी साफ सुथरा है। रेलवे स्टेशन के बाहर खूबसूरत उद्यान बना है जिसमें तरह तरह के फूल हैं। दूसरे दर्जे का प्रतीक्षालय भी एक दम चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। शौचालय की सफाई भी अति उत्तम है। ऐसे साफ सुथरे रेलवे स्टेशन कम ही दिखाई देते हैं। स्टेशन परिसर में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी है जिसमें बैतूल जिले के आदिपासी डंडा नृत्य, आदिवासी गायकी नृत्य, तेजपत्ता के जंगल, सागवान के जंगल और दूसरे तरह के जंगलों के बारे में तथा मुक्तागिरी जैन तीर्थ स्थान सम्बन्धी जानकारी दी गई है।
स्थानांणतरण नहीं हो रहा हो तो मुक्तागिरी के दर्शन करो....?
मुक्तगिरी प्रसिद्ध जैन मंदिर है जो की उचे पहाड़ों और झरनों की बीच स्थित है। यह जगह शासकीय नौकरी करने वालो में भी अत्यन्त ही प्रसिद्ध है ,बोलते है की यदि वहां पर जाकर कोई भी ट्रान्सफर की अपेक्छा करता है तो वह निश्चित ही पूरा हो जाता है। यही सोचकर मई भी वह पर दर्शन के लिए गया था ,और चाहे जो भी मूल कारण हो 07 में मुझे म प से छत्तीसगढ़ से स्थानांतरण आदेश मिल गया था ,और यही बात मेरे बाद मेरे एक मित्र ने भी बताई थी।
विकासखण्ड भैसदेही की ग्राम पंचायत थपोडा में स्थित है महान जैन तीर्थ मुक्तागिरी। मुक्तागिरी अपनी सुन्दरता, रमणीयता और धार्मिक प्रभाव के कारण लोगों को अपनी और आकर्षित करता है । इस स्थान पर दिगम्बर जैन संप्रदाय के 52 मंदिर है। इन मंदिरों की तथा क्षेत्र का संबंध श्रेणीक विम्बसार से बताया जाता है। यहां मंदिर में भगवान पाश्र्वनाथ की सप्त फणिक प्रतिमा स्थापित है जो शिल्पकारी का बेजोड नमूना है। इस क्षेत्र में स्थित यह एक मन कों शांति और सुख देने वाला जगह है। निर्वाण क्षेत्र में आने वाले प्रत्येक व्यकित को यहां आकर सुकून मिलता है।
राजा जैतपाल बैतूल जिले में 11 वीं शताब्दी में भोपाली क्षेत्र में राज करता था। उसकी राजधानी खेड़लादुर्ग में थी। इस दुर्ग के तक्कालीन अधिपति राजा जैतपाल ने ब्रहम का साक्षात्कार न करा पाने के कारण हजारों साधु सन्यासियों को कठोर दण्ड दिया था। इसकी मांग के अनुसार महापंडितों योगाचार्य मुकुन्दराज स्वामी द्वारा दिव्यशकित से ब्रहम का साक्षात्कार कराया था तथा इस स्थान पर दण्ड भोग रहे साधु सन्यासियों को पीड़ा से मुक्त कराया था उन्होंने हजारों सालों से संस्कृत में धर्मग्रंथ लिखे जाने की परम्परा को तोड़ा। उन्होनें मराठी भाषा मे लिखें सिन्धु की महत्ता पूरे महाराष्ट्र प्रान्त में है। यह स्थान पुरातत्व एवं अध्यात्म की दृषिट से अति प्राचीन है।
तांगा की सरपट सरपट दौड़
बैतूल की सड़कों में में आज भी तांगा सरपट सरपट दौड़ लगाता है। वह पर मुझे काफी दिनों के बाद फिर तांगे पर सफर का मौका मिला। कोठी बाजार से रेलवे स्टेशन के लिए आटो वाले 10 रुपये लेते हैं तो तांगे वाले 5 रुपये में ही पहुंचा देते हैं। घोड़ाडोंगरी ब्लॉक में स्थित सारणी बिजली पैदा करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
मलाजपुर स्थित भूत भागने की जगह भी काफी प्रसिद्ध है। मलाजपुर में गुरूबाबा साहब का मेला प्रतिवर्ष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर तकरीबन एक माह बसंत पंचमी तक चलता है। बाबा साहब की समाधि की मान्यता है इसकी परिक्रमा करने वाले को प्रेत बाधाओं से छुटकारा मिलता है। यहां से कोर्इ भी निराष होकर नहीं लौटता है। इस वजह से मेला में दूर-दूर से श्रद्धालु आते है। मलाजपुर जिला मुख्यलाय से 42 किलामीटर की दूरी पर विकासखण्ड चिचोली में सिथत है।
मलाजपुर में गुरूबाबा साहब का समाधि काल 1700-1800 र्इसवी का माना जाता है। यहां हर साल पौष की पूर्णिता से मेला शुरू होता है। बाबा साहब का समाधि स्थल दूर-दूर तक प्रेत बाधाओं से मुकित दिलाने के लिये चर्चित है। खांसकर पूर्णिमा के दिन यहां पर प्रेत बाधित लोगों की अत्यधिक भीड रहती है। यहां से कोर्इ भी निराश होकर नहीं लौटता है। यह सिलसिला सालों से जारी है। उन्होंने कहां कि यहा पर बाबा साहब तथा उन्हीं के परिजनों की समाधि है। समाधि परिक्रमा करने से पहले बंधारा स्थल पर स्नान करना पड़ता है, यहां मान्यता है कि प्रेत बाधा का शिकार व्यकित जैसे-जैसे परिक्रमा करता है वैसे वैसे वह ठीक होता जाता है। यहां पर रोज ही शाम को आरती होती है। इस आरती की विशेषता यह है कि दरबार के कुत्ते भी आरती में शामिल होकर शंक, करतल ध्वनी में अपनी आवाल मिलाते है। इसकी लेकर महंत कहते है कि यह बाबा का आशीष है। मह भर के मेला में श्रद्धालुओं के रूकने की व्यवस्था जनपद पंचायत चिचोली तथा महंत करते है। समाधि स्थल चिचोली से 8 किमी. दूर है। यहां बस जीप या दुख के दुपाहिया, चौपाहिया वाहनों से पहुंचा
जा सकता है। मेला में सभी प्रकार के सामान की दुकाने सजती है
Saturday, 16 January 2016
" एक दिन जंगल के नाम "
"जिसने तेंदुआ न देखा उसने क्या जंगल देखा "
मैंने बालाघाट,कवर्धा ,मंडला जिले के बॉर्डर को जोड़ने वाली , कान्हा के बफर ज़ोन सूपखार ,बीठली के जंगलों की वर्ष 1982 से ८५ के मध्य अपने राजनांदगांव की ब्लॉक बोडला ,बाद में कवर्धा के पोस्टिंग के दौरान अनेको बार भ्रमण किया। जो की कई प्रकार के पशुओं जैसे बाघ, तेंदुआ, ढोल (जंगली कुत्ते), गौर (बाईसन), चीतल, सांभर, चोसिंघा, जंगली सूअर आदि को रहने एवं अपना भोजन ढूँढने के लिए सहायक हैं। दूधराज, मोर, सफ़ेद पेट वाला कटफोड़वा, भूरा कटफोड़वा, क्रेस्टेड सर्पंएंट ईगल, चेंजबल हॉक ईगल, वाइट रम्प जैसे दुर्लभ पक्षी भी सूपखार और आसपास के घने जंगल में बहुतायत से मिलते है। सूपखार में रुकने के लिए कई जंगल विभाग के विश्रामगृह बने हुए है जो की तब वाइल्डलाइफ सफारी के लिए आने वाले मेहमानों को न सिर्फ ठहरने की अच्छी व्यस्था बल्कि अच्छे खाने की सुविधा भी उपलब्ध करते हैं। और तब कलेक्टर /कमिश्नर और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियो को को ठहरने के लिए जंगल में एक अच्छी व्यस्था थी। एक दिन हम वहां के भ्रमण में परिवार के साथ अपनी बंद जीप में निकले / जँगल प्रारम्भ होते ही नदी के किनारे की ताज़ी हवा मिल जाने से हम लोग पहले की बड़े खुशी महसूस कर रहे थे। चिल्फी से निकलते समय मुहँ अँधेरे में ही ड्राईवर ने कुछ आवाज़ें सुनकर गाड़ी रोक दी .देखा तो तेंदुआ था। तेंदुआ, बेहद खूबसूरत जानवर होता है, उसकी ताकत और शान देखते ही बनती है। बाघ के विपरीत तेंदुए की चमड़ी पीलापन लिए हुए होती है और उस पर काले भूरे बेतरतीब रिंग्नुमा निशान होते है। तेंदुआ आमतौर पर छोटे जानवरों का शिकार करता है जैसे हिरन, जंगली सूअर के बच्चे, लंगूर। कहते है की अपने शिकार को अन्य बड़े शिकारियों से बचाने के लिए तेंदुआ उसे पेड़ के शाखों के बीच छुपा देता है और वहीं बैठ कर आराम से खाता है। लेकिन मुझे ऐसे देखने का अवसर नही मिला। एक बार शिकार करने के बाद कई दिनों तक वह उसी शिकार को खाता है और करीब ४-५ दिन बाद अगला शिकार करता है, बेहद खूबसूरत जंगल के बीच हम लोग धीरे धीरे चल रहे थे की तभी दायीं तरफ से बांस की शाखों के चटखने की आवाज़े आई, हम उत्साहित होकर बांस के झुरमुट की तरफ देखने लगे, वहां एक हिरन का छोटा बच्चा था जो झाड़ियो की पत्ती खा रहा था, हमे देख कर वो पीछे हट गया. एकदम से बांस बांस के झुरमुट में काफी हलचल शुरू हो गयी और ध्यान से देखने पर समझ में आया की यह तो छोटे बड़े हिरणो का एक पूरा झुण्ड है। उन को देख लेने लेने के बाद हम फिर और जानवरो की तलाश में निकल पड़े। तभी वह के पानी के तालाब के पास हमने बंदरों का समूह देखा जो पानी पीने आया था, दुधमुहे छोटे बच्चे अपनी अपनी माँ से चिपके हुए थे और थोड़े युवा बच्चे एक दुसरे को पकड़ने के खेल में मस्त थे। पूरा समूह जोश से भरा हुआ उचल कूद कर रहा था। हमने ध्यान से देखा तो एक बन्दर एकदम ध्यान भरी मुद्रा में सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठा सारे जंगल की निगरानी कर रहा था, वो सामान्य लग रहा था पर वो दूसरी दिशा में बड़े ध्यान से कुछ देख रहा था, हमने भी वहीँ रुकने का फैसला किया ताकी हम जंगल से आ रही आवाजें सुन सके और वह की मूवमेंट को समझ सके। कुछ ही मिनिट बीते होंगे के वो बन्दर बैचन होकर "ख़र्र खो खो" ऐसी आवाज़े निकलने लगा जिसका साफ़ मतलब था की वो अपने समूह को जंगले की तरफ से आते खतरे से सचेत कर रहा था, इसे अलार्म कॉल करते हैं। तभी २ और नर बन्दर ऊँचे पदों पर चढ़ गए और चिल्लाने लगे, पूरा समूह क्षण भर में पेड़ पर चढ़ गया और पीछे की तरफ भागने लगा, हम जंगल के इन पहरेदारों को ध्यान से देख रहे थे ताकि कुछ अनुमान लगा सके की वो जंगल के किस शिकारी पशु को देख कर घबरा रहे हैं। बंदरो की चीख पुकारों के साथ ही साथ कुछ सीटी बजने जैसी तीखी आवाज़े भी सुनाई देने लगी, अफसर को समझते देर न लगी की जंगली कुत्तो का एक झुण्ड शिकार की तलाश में हमारी तरफ आ रहा है। जंगली कुत्ते भी जंगल में कम ही दिखाई देते है। उस झुण्ड में ९ सदस्य थे, पूरा झुण्ड तालाब के पास आया और पानी पीने लगा। कुत्तों का झुण्ड १५ मिनिट तक पानी पीने के बाद वापस जंगल की तरफ लौट गया। हमने हमारी किस्मत को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गये। मेरे बर्ड के शौक के कारण रास्ते भर मैं पक्षी देखता हुआ चल रहा था। . मैंने रास्ते में कई सुन्दर पक्षियों से भेट हुआ। उनमे सबसे अच्छा था कटफोड़वा, ये पक्षी सिर्फ भारत के जंगलो में ही पाये जाते है। कटफोड़वा एक पेड़ के तने में अपनी चोंच से कीड़ो को निकाल निकाल कर खा रहा था। विश्राम गृह का छेत्र सबसे खूबसूरत इलाका है, यहाँ कई जानवर नदी में पानी पिने आये हुए थे और नदी किनारे की नरम घांस को चर रहे थे, इन जानवरों में गौर का एक बड़ा झुंड, चीतल, सांभर के कई छोटे छोटे झुण्ड काफी आकर्षक लग रहे थे। हमने मन भर कर प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों की जी भर कर निहारा। । किन्तु बाघ , तेंदुआ न देख पाने का दुख अब तक जा चुका था। वापस जाते समय मैंने वही पास ही में एक दूधराज पक्षी देखा। अत्यंत दुर्लभ दूधराज सफ़ेद रंग का बुलबुल के आकार का पक्षी होता है जिसकी लम्बी सफ़ेद पूँछ होती है और हवा में उड़ते समय किसी रिबन की तरह लहराती है। हम तैयार होकर वापस जंगल की तरफ निकल पड़े और जंगल की शांति को चीरती हुई ग्रे जंगल फाउल की कर्कश ध्वनि सुनते हुए धीरे धीरे आगे जाने लगे। जीप में हमारे साथ २ युवक और भी थे, उनमे से एक पहली ही बार जंगल आया था और अति उत्साहित था, चलते चलते एक मोड़ मुड़ते ही वो चकित होकर पीछे की और देखकर "टाइगर टाइगर" चिल्लाने लगा। हम सब ने पीछे देखा तो एक बड़ा सा नर तेंदुआ झाड़ियों में अन्दर की तरफ जा रहा था। हम कई मिनट तक उसे झाड़ियों के पीछे जाते हुए देखते रहे और आज क्या कमाल का दिन है यह सोचने लगे, आज सुबह से हम , ढोल, हिरन, सांभर, बाईसन ये सभी जंगल के प्रमुख जानवर देख चुके थे । २ बार लंगूरों और चीतल की अलार्म कॉल भी सुनी देखा एक बड़ा नर तेंदुआ रोड पर बिलकुल सड़क किनारे बैठा हुआ था। खूबी है तेंदुए की जो उसको घोस्ट ऑफ़ द जंगल बनाती है। तेंदुआ अपनी खाल के रंग और चुप कर बैठने के तरीके से पर्यवेश में इतना घुल मिल जाता है की पुराने वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स भी आसानी से उसे देख नहीं पाते। रस्ते में एक फारेस्ट गार्ड मिला, वो साइकल लेकर पैदल ही जंगल में गश्त लगा रहा था। इन्ही गार्ड्स की मेहनत, जंगल के ज्ञान और जोखिम लेने के कारण ही आज भी जंगल और उनमे रहने वाले जानवर बचे हुए है। ये गार्ड्स २ ४ घंटे जंगल में रहते हैं और शिकारियों और लकड़ी चुराने वाले बदमाशों को जंगल से खदेड़ते रहते हैं। गार्ड ने हमे बताया की अभी ५ मिनिट पहले नजदीक तालाब की तरफ से चौसिंघा की अलार्म कॉल आ रही थी। चौसिंघा काफी छोटा हिरन प्रजाति का जानवर होता है और इसकी अलार्म कॉल सबसे पक्की होती है। हम गार्ड के बताये हुए इलाके की तरफ तेज़ी से चलने लगे। रस्ते में एक मादा भालू और उसके बच्चे ने हमारे सामने से सड़क पार की और जंगल में भाग गये। और शाम ढलने लगी थी। अँधेरा होने लगा था और वापस लौटने का समय हो चला था। जंगल से बाहर की तरफ आते समय हमने चिल्फी घाटी एरिया में देखा की एक जीप सड़क के एक तरफ खड़ी थी और लोग वह पर खड़े होकर खतरे की परवाह किये बगैर सामने उची टीले पर कुछ देख रहे थे। हम भी उस तरफ जीप के भीतर से ही देखने लगे। जब हमने वह देखा तो हमारे आश्चर्य की सीमा न रही, ऐसा लगा मानो हमारी इच्छा तेंदुए ने सुन ली थी और हमे दर्शन देने फिर पहुच गया था, तभी एक ट्रक की आती आवाज़ ने उसे वह से भगा दिया और हम वापस अपने क़्वार्टर की तरफ लौट चले। वापस आने पर ऐसा लगा मानो इस एक दिन में सारे जंगल की सैर हो गयी
"जिसने तेंदुआ न देखा उसने क्या जंगल देखा "
मैंने बालाघाट,कवर्धा ,मंडला जिले के बॉर्डर को जोड़ने वाली , कान्हा के बफर ज़ोन सूपखार ,बीठली के जंगलों की वर्ष 1982 से ८५ के मध्य अपने राजनांदगांव की ब्लॉक बोडला ,बाद में कवर्धा के पोस्टिंग के दौरान अनेको बार भ्रमण किया। जो की कई प्रकार के पशुओं जैसे बाघ, तेंदुआ, ढोल (जंगली कुत्ते), गौर (बाईसन), चीतल, सांभर, चोसिंघा, जंगली सूअर आदि को रहने एवं अपना भोजन ढूँढने के लिए सहायक हैं। दूधराज, मोर, सफ़ेद पेट वाला कटफोड़वा, भूरा कटफोड़वा, क्रेस्टेड सर्पंएंट ईगल, चेंजबल हॉक ईगल, वाइट रम्प जैसे दुर्लभ पक्षी भी सूपखार और आसपास के घने जंगल में बहुतायत से मिलते है। सूपखार में रुकने के लिए कई जंगल विभाग के विश्रामगृह बने हुए है जो की तब वाइल्डलाइफ सफारी के लिए आने वाले मेहमानों को न सिर्फ ठहरने की अच्छी व्यस्था बल्कि अच्छे खाने की सुविधा भी उपलब्ध करते हैं। और तब कलेक्टर /कमिश्नर और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियो को को ठहरने के लिए जंगल में एक अच्छी व्यस्था थी। एक दिन हम वहां के भ्रमण में परिवार के साथ अपनी बंद जीप में निकले / जँगल प्रारम्भ होते ही नदी के किनारे की ताज़ी हवा मिल जाने से हम लोग पहले की बड़े खुशी महसूस कर रहे थे। चिल्फी से निकलते समय मुहँ अँधेरे में ही ड्राईवर ने कुछ आवाज़ें सुनकर गाड़ी रोक दी .देखा तो तेंदुआ था। तेंदुआ, बेहद खूबसूरत जानवर होता है, उसकी ताकत और शान देखते ही बनती है। बाघ के विपरीत तेंदुए की चमड़ी पीलापन लिए हुए होती है और उस पर काले भूरे बेतरतीब रिंग्नुमा निशान होते है। तेंदुआ आमतौर पर छोटे जानवरों का शिकार करता है जैसे हिरन, जंगली सूअर के बच्चे, लंगूर। कहते है की अपने शिकार को अन्य बड़े शिकारियों से बचाने के लिए तेंदुआ उसे पेड़ के शाखों के बीच छुपा देता है और वहीं बैठ कर आराम से खाता है। लेकिन मुझे ऐसे देखने का अवसर नही मिला। एक बार शिकार करने के बाद कई दिनों तक वह उसी शिकार को खाता है और करीब ४-५ दिन बाद अगला शिकार करता है, बेहद खूबसूरत जंगल के बीच हम लोग धीरे धीरे चल रहे थे की तभी दायीं तरफ से बांस की शाखों के चटखने की आवाज़े आई, हम उत्साहित होकर बांस के झुरमुट की तरफ देखने लगे, वहां एक हिरन का छोटा बच्चा था जो झाड़ियो की पत्ती खा रहा था, हमे देख कर वो पीछे हट गया. एकदम से बांस बांस के झुरमुट में काफी हलचल शुरू हो गयी और ध्यान से देखने पर समझ में आया की यह तो छोटे बड़े हिरणो का एक पूरा झुण्ड है। उन को देख लेने लेने के बाद हम फिर और जानवरो की तलाश में निकल पड़े। तभी वह के पानी के तालाब के पास हमने बंदरों का समूह देखा जो पानी पीने आया था, दुधमुहे छोटे बच्चे अपनी अपनी माँ से चिपके हुए थे और थोड़े युवा बच्चे एक दुसरे को पकड़ने के खेल में मस्त थे। पूरा समूह जोश से भरा हुआ उचल कूद कर रहा था। हमने ध्यान से देखा तो एक बन्दर एकदम ध्यान भरी मुद्रा में सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठा सारे जंगल की निगरानी कर रहा था, वो सामान्य लग रहा था पर वो दूसरी दिशा में बड़े ध्यान से कुछ देख रहा था, हमने भी वहीँ रुकने का फैसला किया ताकी हम जंगल से आ रही आवाजें सुन सके और वह की मूवमेंट को समझ सके। कुछ ही मिनिट बीते होंगे के वो बन्दर बैचन होकर "ख़र्र खो खो" ऐसी आवाज़े निकलने लगा जिसका साफ़ मतलब था की वो अपने समूह को जंगले की तरफ से आते खतरे से सचेत कर रहा था, इसे अलार्म कॉल करते हैं। तभी २ और नर बन्दर ऊँचे पदों पर चढ़ गए और चिल्लाने लगे, पूरा समूह क्षण भर में पेड़ पर चढ़ गया और पीछे की तरफ भागने लगा, हम जंगल के इन पहरेदारों को ध्यान से देख रहे थे ताकि कुछ अनुमान लगा सके की वो जंगल के किस शिकारी पशु को देख कर घबरा रहे हैं। बंदरो की चीख पुकारों के साथ ही साथ कुछ सीटी बजने जैसी तीखी आवाज़े भी सुनाई देने लगी, अफसर को समझते देर न लगी की जंगली कुत्तो का एक झुण्ड शिकार की तलाश में हमारी तरफ आ रहा है। जंगली कुत्ते भी जंगल में कम ही दिखाई देते है। उस झुण्ड में ९ सदस्य थे, पूरा झुण्ड तालाब के पास आया और पानी पीने लगा। कुत्तों का झुण्ड १५ मिनिट तक पानी पीने के बाद वापस जंगल की तरफ लौट गया। हमने हमारी किस्मत को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गये। मेरे बर्ड के शौक के कारण रास्ते भर मैं पक्षी देखता हुआ चल रहा था। . मैंने रास्ते में कई सुन्दर पक्षियों से भेट हुआ। उनमे सबसे अच्छा था कटफोड़वा, ये पक्षी सिर्फ भारत के जंगलो में ही पाये जाते है। कटफोड़वा एक पेड़ के तने में अपनी चोंच से कीड़ो को निकाल निकाल कर खा रहा था। विश्राम गृह का छेत्र सबसे खूबसूरत इलाका है, यहाँ कई जानवर नदी में पानी पिने आये हुए थे और नदी किनारे की नरम घांस को चर रहे थे, इन जानवरों में गौर का एक बड़ा झुंड, चीतल, सांभर के कई छोटे छोटे झुण्ड काफी आकर्षक लग रहे थे। हमने मन भर कर प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों की जी भर कर निहारा। । किन्तु बाघ , तेंदुआ न देख पाने का दुख अब तक जा चुका था। वापस जाते समय मैंने वही पास ही में एक दूधराज पक्षी देखा। अत्यंत दुर्लभ दूधराज सफ़ेद रंग का बुलबुल के आकार का पक्षी होता है जिसकी लम्बी सफ़ेद पूँछ होती है और हवा में उड़ते समय किसी रिबन की तरह लहराती है। हम तैयार होकर वापस जंगल की तरफ निकल पड़े और जंगल की शांति को चीरती हुई ग्रे जंगल फाउल की कर्कश ध्वनि सुनते हुए धीरे धीरे आगे जाने लगे। जीप में हमारे साथ २ युवक और भी थे, उनमे से एक पहली ही बार जंगल आया था और अति उत्साहित था, चलते चलते एक मोड़ मुड़ते ही वो चकित होकर पीछे की और देखकर "टाइगर टाइगर" चिल्लाने लगा। हम सब ने पीछे देखा तो एक बड़ा सा नर तेंदुआ झाड़ियों में अन्दर की तरफ जा रहा था। हम कई मिनट तक उसे झाड़ियों के पीछे जाते हुए देखते रहे और आज क्या कमाल का दिन है यह सोचने लगे, आज सुबह से हम , ढोल, हिरन, सांभर, बाईसन ये सभी जंगल के प्रमुख जानवर देख चुके थे । २ बार लंगूरों और चीतल की अलार्म कॉल भी सुनी देखा एक बड़ा नर तेंदुआ रोड पर बिलकुल सड़क किनारे बैठा हुआ था। खूबी है तेंदुए की जो उसको घोस्ट ऑफ़ द जंगल बनाती है। तेंदुआ अपनी खाल के रंग और चुप कर बैठने के तरीके से पर्यवेश में इतना घुल मिल जाता है की पुराने वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स भी आसानी से उसे देख नहीं पाते। रस्ते में एक फारेस्ट गार्ड मिला, वो साइकल लेकर पैदल ही जंगल में गश्त लगा रहा था। इन्ही गार्ड्स की मेहनत, जंगल के ज्ञान और जोखिम लेने के कारण ही आज भी जंगल और उनमे रहने वाले जानवर बचे हुए है। ये गार्ड्स २ ४ घंटे जंगल में रहते हैं और शिकारियों और लकड़ी चुराने वाले बदमाशों को जंगल से खदेड़ते रहते हैं। गार्ड ने हमे बताया की अभी ५ मिनिट पहले नजदीक तालाब की तरफ से चौसिंघा की अलार्म कॉल आ रही थी। चौसिंघा काफी छोटा हिरन प्रजाति का जानवर होता है और इसकी अलार्म कॉल सबसे पक्की होती है। हम गार्ड के बताये हुए इलाके की तरफ तेज़ी से चलने लगे। रस्ते में एक मादा भालू और उसके बच्चे ने हमारे सामने से सड़क पार की और जंगल में भाग गये। और शाम ढलने लगी थी। अँधेरा होने लगा था और वापस लौटने का समय हो चला था। जंगल से बाहर की तरफ आते समय हमने चिल्फी घाटी एरिया में देखा की एक जीप सड़क के एक तरफ खड़ी थी और लोग वह पर खड़े होकर खतरे की परवाह किये बगैर सामने उची टीले पर कुछ देख रहे थे। हम भी उस तरफ जीप के भीतर से ही देखने लगे। जब हमने वह देखा तो हमारे आश्चर्य की सीमा न रही, ऐसा लगा मानो हमारी इच्छा तेंदुए ने सुन ली थी और हमे दर्शन देने फिर पहुच गया था, तभी एक ट्रक की आती आवाज़ ने उसे वह से भगा दिया और हम वापस अपने क़्वार्टर की तरफ लौट चले। वापस आने पर ऐसा लगा मानो इस एक दिन में सारे जंगल की सैर हो गयी
Saturday, 7 March 2015
वन्दे मातरम Vs जन गण मन
देवेन्द्र कुमार शर्मा , सुन्दरनगर , रायपुर ,छत्तीसगढ़
पहले वन्दे मातरम की कहानी। ये वन्दे मातरम नाम का जो गान है जिसे हम राष्ट्रगान के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था। बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रन्तिकारी विचारधारा के व्यक्ति थे।
देश के साथ-साथ पुरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से उनके दोस्तों की मृत्यु भी हो गयी। इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया उन्होंने। बाद में उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था "आनंदमठ", जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लुट रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मुर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस किताब में लिखी। वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया। जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया।
तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और अलग-अलग जगह उसे छपवाया औए फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया। अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा दिया फिर छपाऔर फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के बाद 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पुरे देश में एक लहर पैदा किया। शुरू में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गया जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बात हो गयी थी।इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और ये उनकी भावना थी कि लोग भी ऐसा करेंगे। बंकिम बाबु की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबु कहते थे कि अभी तुमको शायद समझ में नहीं आ रहा है लेकिन ये गान कुछ दिन में देश के हर जबान पर होगा, लोगों में जज्बा पैदा करेगा और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगान बनेगा। ये गान देश का राष्ट्रगान बना लेकिन ये देखने के लिए बंकिम बाबु जिन्दा नहीं थे लेकिन जो उनकी सोच थी वो बिलकुल सहीसाबित हुई| 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगान बन गया।
1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बटवारा कर दिया था। अंग्रेजों का
एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो हिस्सों में बाट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल। इस बटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है। ये देश में धर्म के नाम पर पहला बटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था।
खैर ...............इस बंगाल बटवारे का पुरे देश में जम के विरोध हुआ था, उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार बनाया।और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा। कार्यक्रम के शुरू में भी और अंत में भी। धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी। अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और ज्यादा जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे। एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी।
मात्र 14 साल की उम्र में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो उन्होंने फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था। इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के बाद जितने भी क्रन्तिकारी हुए उन सब ने जहाँ मौका मिला वहीं ये घोष करना शुरू किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब के जबान पर मंत्र हुआ करता था। ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है। कुछ वर्ष पहले इस देश के सुचना विभाग (Information bureau) ने एक सर्वे कराया जिसमे देश के लोगों से ये पूछा था कि देश का कौन सा गीत सबसे पसंद है आपको, तो सबसे ज्यादा लोगों ने वन्दे मातरम को पसंद किया था और फिर इसी विभाग ने पाकिस्तान और बंग्लादेश में यही सर्वे कराया तो वहां भी ये सबसे लोकप्रिय पाया गया था। इंग्लैंड की एक संस्था है बीबीसी उसने भी अपने सर्वे में पाया कि वन्दे मातरम विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत है।
जन गण मन की कहानी
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।
उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "
जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।
उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।
रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।
1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।
गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।
बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।
नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का।
इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्।
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