Wednesday, 3 August 2016

   गहनों से सजी धजी लाल साडी में दुल्हन को दौड़ते देख किसी खतरे की आशंका या फिर मानवीय संवेदनशीलता कहे, उसने चलती रेलगाड़ी रोक दी ,,,,,,,?


मेरी माता जी जब भी इस छोटी लाइन की रेलगाड़ी को देखती तो उनके आँखों के सामने शादी के बाद की उनकी ससुराल से पहली पहली बार मायके जाने का दृश्य झूलने लगता।
वे दुर्ग(नाना जी के पैतृक मकान) से शादी होकर के ग्राम सोनपुर में व्याह होकर आयी थी। शहर से उनका किसी गांव में आने का यह पहला मौका था। क्योंकि उनकी शिक्षा दीक्षा दुर्ग शहर में ही हुआ था। खैर तब आवागमन के साधन काफी ही कम होने से बैलगाड़ी ही एकमात्र साधन हुआ करता था। के साधन काफी ही कम होने से बैलगाड़ी ही एकमात्र साधन हुआ करता था। अभनपुर तक गांव से 15 किलोमीटर की यात्रा बैलगाड़ी में बैठकर रेल पकड़ने आयी थी। सो उसी से वे रायपुर स्थित अपने मायके के मकान जहा उनके पिता जी सर्विस में थे। में जाने के लिए निकली थी। और सुबेरे सुबेरे को रेलगाड़ी थी।
जब तक स्टेशन पहच प्लेटफार्म से बाहर बैलगाड़ी को खड़े कर नौकर उनका सामान निकलने लगे। रेलगाड़ी ने सिटी देकर भक भक धुंए छोड़ने चालू कर दिए।
माता जी की सहायता करने गांव से घर का दरोगा भी साथ में आया था। . देखते ही देखते रेल गाड़ी के चक्के ने घूमना प्रारम्भ कर दिये।
.अब घबरा कर लाल साडी पहनी गहनों से सजी धजी सहित दुल्हन बैलगाड़ी में से कूद पड़ी। क्योंकि दूसरी ट्रेन शाम में थी और या फिर बैलगाड़ी के कष्ट दायक यात्रा करना होता।
उधर दरोगा भी अपने सर में बांधे लाल गमछे को खोलकर हिलाते हुए गाड़ी रोको रोको चिल्लाते हुए नई नवेली मालकिन जिसे उसे पहुंचाने का दायित्व दिया गया था , चलती रेल के साथ दौड़ रही है,के पीछे वो भी गाड़ी के साथ दौड़ने लगा । ( क्योंकि उसने सुन रखा था कि लाल कपड़े देख रेल गाड़ी रुक जाती है )
माध्यमिक स्कूल में माता जी दौड़ में स्कूल चैंपियन भी रही है ,वे भी ट्रेन में चढ़ने दौड़ लगाने लगी। इनके पीछे पीछे बैलगाड़ी चालक नौकर सर में संदूक लिए दौड़ने लगा।
लाल साडी में दुल्हन ,लाल गमझे फहराते दरोगा को देख यात्रियो ने भी चिल्लाना शुरू कर दिया ।
खैर गार्ड का डिब्बा पार नही हुआ था , हरी झंडी दिखाते दिखाते पूरा माज़रा देख न जाने उसे क्या समझ आया उसने हिलते लाल गमझे और लालसाडी में गहनोंसे सजी धजी दुल्हन को दौड़ते देख किसी खतरे की आशंका या फिर मानवीय संवेदनशीलता कहे सिटी देकर लाल झड़ी दिखाने शुरू कर दिया।
गाड़ी का ड्राइवर और इंजिन में कोयला झोकते फायरमैन भी ये नज़ारा देख रहे थे।
धक् धक् धक् भक भक करते हुए सिटी बजाते गाड़ी खड़ी हो गई। माता जी कोउनके मायके तक सुरक्षित पहुचाने वाले सभी लोग जब रेल में सवार हो गए ,फिर रेल चल पड़ी
और ये घटना रायपुर पहुचते तक यात्रिओ का मनोरंजन का केंद्र रही तो नई नवेली दुल्हन के शर्माने का भी ,जिसने अनजाने में ही दौड़ लगा दी थी।
इस ट्रेन पर जब भी उनकी नज़र पड़ती वे हमे अपनी शादी के बाद की ये पहली घटना जरूर ही सुनाती थी। और मुझे भी मेरी माता जी जो हमारे बीच नही है।
इस रेल गाड़ी को देखते ही उनकी याद जरूर आ जाती है।और इस बात का दुःख भी रहेगा की ये गाड़ी अब हमेशा के लिए कुछ वर्षो बाद हमसे बिदा ले लेगा।साथ ही माता जी स्मृतियों से जुडी एक और महत्वपूर्ण कड़ी भी।
 आदरणीय कलाम साहब (भु पु राष्ट्रपति ) तथा एशिया के एकमात्र सायफन सिस्टम से बने बांध माड़मसिल्ली की इंजीनियर मैडम सिल्ली भी इस ट्रेन में सफर किये हुए है ।

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Lalit Sharma रोचक संस्मरण। वैसे यह ट्रेन अब हैरिटेज की श्रेणी में आ चुकी है, इसे बंद नहीं करना चाहिए। इस पर मेरा एक लेख प्रकाशित है। इस "दूडबिया गाड़ी" के साथ लोगों की बहुतेरी यादें जुड़ी हैं।
Dk Sharma इस "दूडबिया गाड़ी" में राजिम से रायपुर तक का सफर बचपन में कर चूका हु ,बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव प्राप्त होता है। छत्तीसगढ़ के जीवन के अनुभव लेना है तो इससे अच्छी और कोई गाड़ी नही है। वाकई में इसे बंद नही करना चाहिये।
Lalit Sharma इस पर शीघ्र ही एक डाक्यूमेंट्री करने का इरादा है।
Dk Sharma मेरी हार्दिक शुभकामना आपके साथ है।
Subhash Chandra रोचक संस्मरण
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Dk Sharma
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Ashutosh Singh सर मुझे भी इस बात का अब अपसोस हो रहा है की मैं इतने पास रहते कभी भी इस ट्रेन में यात्रा नही कर पाया. सर यह बात सही है की कुछ चीजे पास रह कर भी बहुत दूर होती है जैसे की यह ट्रेन. आपका प्रतिउत्तर चाहिए
Dk Sharma सही बात है आशुतोष जी , आप रोज़ इस गाड़ी की आवाज़ सुनते रहे किन्तु इसमें यात्रा नही कर पाये। क्योंकि जीवन की आपाधापी में मन ज्यादा सुविधापूर्ण साधन चाहता है। आप पुनः पधारे आपके साथ मैं भी राजिम या धमतरी की यात्रा इस हैरिटेज की श्रेणी में आ चुकी रेलगाड़ी में कर आऊंगा। वैसे आप अभी कहा पर है।
Ashutosh Singh अब तो जरूर आपके साथ यात्रा करनी ही है.
Dk Sharma

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Sk Mishra अदभुत ! रोचक ! बचपन में मैं भी एक बार बैठ चुका हूं !
Dk Sharma sir आपने कहा से कहा तक की यात्रा की थी ..?
Sharad Shukla अच्छा संस्मरण। छोटी लाइन की ट्रेन अब बंद हो रही हैं। कोयले वाली ट्रेन से भी बहुत सी यादें जुडी हैं।
Sk Mishra कुरुद के पास चार्मुडिया गाँव मै भाभी जी को लिवाने गया था ! सम्भवतः कुरुद या आस पास के किसी स्टेशन से बैठ कर रायपुर तक आया था ! वाकया इस प्रकार है ! बात बहुत पुरानी है ! तब मेरी स्कूली पढाई जारी थी ! एक बार मेरे बड़े भाई साहब मुझे भाभी जी को लिवाने चा...See More
Dk Sharma जी ह श्री लालता प्रसाद मिश्र जी को जानता हु ,अब बिलासपुर सरकंडा में बस गए है। वैसे चारमुड़िया ब्लॉक हेड क्वार्टर था कुरुद का। पुराने रिकॉर्ड में कुरुद को चारमुड़िया ब्लॉक के नाम से जानते है। और वह के स्टेशनमास्टर का क्वार्टर ही BDO quarter था. ब्रिटिश जमाने में चारमुड़िया होते हुए ट्रेन महानदी को पार करके मगरलोड ,नगरी के गांव को पर करके जैपोर उड़ीसा तक जाती थी
Sk Mishra 1985-86 में जब मैं नगरी में मंडी निरीक्षक के रुप में पदस्थ था, तब यहाँ से ब्रिटिश ज़माने में रेलवे लाइन गुजरने के बारे में सुना था ! जहाँ तक याद आता है, मैने वहाँ कहीँ रेलवे लाइन का अस्तित्व भी देखा था !
UnlikeReply111 hrs
Dk Sharma
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Dk Sharma Shukla ji कोयले वाली ट्रेन से भी बहुत सी यादें जुडी हैं। जब बिलासपुर से पिपरिया अपने नानी जी को छोड़ने जाया करता था। पुरे कपडे काले तो होते थे चेहरा भी पानी से धोने पर सिर्फ काला काला ही रंग निकलते था। और कभी आँख में चला गया तो भगवान ही मालिक । साथ ही शहडोल पहुचते तक रास्ते की खुबसुरती ,सिटी और गाड़ी की आवाज़ बड़ी ही मनमोहक हुआ करती थी।
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Prakash Kumar sunder sir ji
UnlikeReply118 hrs
Pran Chadha इस मॉडल का एक इंजन बिलासपुर स्टेशन के सामने यादगार बन कर रखा गया है।
UnlikeReply113 hrs
Dk Sharma श्री मिश्र जी मेघा से मोहंदी सिंगपुर दुधली में प्लेटफार्म ,के अवशेष पुराने रेलवे कुए ,तथा पटरी के नीचे के बिछी गिट्टी व् लकड़ी के पुल तो मैंने भी देखा है। आदरणीय कलाम साहब (भु पु राष्ट्रपति ) तथा एशिया के एकमात्र सायफन सिस्टम से बने बांध माड़मसिल्ली की इंजीनियर मैडम सिल्ली भी इस ट्रेन में सफर किये हुए है ।
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Sk Mishra वाह ! बहुत खूब !
UnlikeReply111 hrs

Saturday, 16 July 2016

मृतात्मा मेरी ऊँगली में सवार. ,,,,,,,.. रुकने का नाम ही न ले ,मै पसीना पसीना (आपबीती )
,
---बात तब की है जबकि हमने इलेवन्थ का एग्जाम दिया था। रिजल्ट नही आये थे। मुहल्ले के और दोस्तों ने रामशलाका का उपयोग किया ।
लेकिन रिजल्ट गड़बड लग रहा था उन्हें। उन लोगो ने कहि सुना था की,मृतात्मा को बुलाने से वो सही सही बात बताती है।
मुझे भी शामिल कर एक बंद कमरे में पुराने कैलंडर के पीछे सफ़ेद भाग पर पर परकाल से गोल घेरा बनाकर स्केल की मदद से बीचो बीच सीधी लाइन खींचा गया।
जिसमे एक ओर यस २रे ओर नो लिखा गया। रात के 11 बज रहे थे। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। कहि दूर से क्भी कभी कुत्ते की भोकने कि आवाज वातावरण को और डरावना बना दे रही थी ।
दोस्तों का कहना था कि आत्मा को प्रकाश पसंद नही। बंद कर दिए गये लाइट। मोमबत्ती की प्रकाश कमरे को भयावह रूप दे रही थी। हमको अपना रिजल्ट जानना था सो बैठे रहे।
फिर शुरू हुआ आव्हान आत्मा के नाम से मृतकों के नाम लेकर बुलाने का सिलसिला ।
एक पुरानी शीशी के ढक्कन को बीचोबीच गोल घेरे मे रखा गया। फिर जिन के भी नाम याद आ रहे थे आमन्त्रित किया। एक नाम पर ऊँगली टस से मस ही नही हुई । हम चारो एक दूसरे के चेहरे को देखने लगे।
तभी एक ने कहा यार वो साला अभी ,तो जिन्दा है उसकी आत्मा कहा से आयेगी। और हम लोग हस पड़े ।
फिर मरे लोगो के नाम लेकर कन्फर्म किया. फिर शुरू हुआ आत्मा को आव्हान करने का कार्यक्रम।
एक आत्मा का नाम लेकर आने के लिए बोला गया कि हे श्री,,,, जी आप भूमि लोक में आकर हमारे कुछ प्रश्नो का जवाब दे ,मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही थीं।
मैने कहा पहले मेरा रिजल्ट बताओ।
दोस्त जिसकी ऊँगली ढक्कन के ऊपर थी। ने कहा , हे पवित्र आत्मा आप आ गए है तो प्रमाण देवे। अचानक मोमबत्ती की लौ तेज़ हो गई। और दोस्त की उँगली के नीचे का ढक्कन काँपते हुए यस लिखे की ओर चलकर फिर वापस अपनी जगह में आ गया।
दोस्त ने बोला की ये देवेन्द्र हमारे बीच है , इलेवन्थ मे पास होगा की नही।
ढक्कन नही हिला ,मैंने कहा हे पवित्र ,,,,,जी की आत्मा प्लीज़ बताइये न ये हमारे जीवन मरण का सवाल हैं।
फ़ैल होने पर बड़ा भाई पीटेगा ,व् घर वाले भी नाराज़ होंगे। प्लीज़ ,,प्लीज़। अचानक ढक्कन पहले गोल घेरे मे घूमने लगा। प्लीज़ मैंने फिर से निवेदन किया।
उंगली के नीचे ढक्कन नो की ओर जाने लगा। मेरी साँस तेज़ हो गयी। लगा की फेल हो जाऊंगा। नो को टच कर ढक्कन फिर घेरे में गोल- गोल घूमने लगा। और फिर अचानक यस की ओर चल पडा। ह,,,,,, गहरी साँस ली मैंने।
फिर वापस डगमग करते गोल घेरे और फिर एकबार यस में।
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। लेकिन एक बार नो में क्यू मैं सोचने लगा।
(इस में भी एक रहस्य था जिसे आगे कभी बताउंगा )
फिर उस आत्मा से छमा मांग उन्हें वापिस जाने का निवेदन किया गया।
अब दूसरे दोस्तों ने मुझे अपनी उंगली उस ढक्कन में रख उसके भविष्य पूछने बोला।
आधेघंटे बीत चूका था मोमबत्ती भी काफी जल चुकी थी। वातावरण भी रहस्य मय हो गया था। पता नही क्यू कुत्ते भी जोर जोर से भौक रहे थे ।
हम लोग सोच नही पा रहे थे की किसे बुलाए। तभी याद आया कि हाल हि में एक महिला नेत्री विमान दुर्घटना में मर गयी है। दोस्तों ने खुसुरपुसुर किया और उसके नाम पर तैय्यार हो गये।
मेरी उंगली ढक्कन पर उस गोल घेरे में रखा ही था की एक कुत्ता घर के ही बाहर ही आकर भोकने लगा , उसे पहले भगाया गया।
चूँकि मेरा रिजल्ट मृतात्मा ने घोषित कर हि दिया था ,खुश हो ऊँगली ढक्कन के ऊपर रख बैठ गया।
अब उस मृत मृतात्मा के नाम लेकर उन्हें अपने बीच आने का निमंत्रण दिया। ऊँगली हिली भी नही।
दोस्तों को लगा की जानबूझकर मैंने ठीक से आव्हान नही किया। क्यूंकि मेरा सवाल तो हल हो ही चूका था।
गम्भीरता से मैंने उनका नाम लेकर फिर आमंत्रित किया , आप आये व् हमारे जवाब देवे ।
तभी ढक्कन थोड़ा सा हिला ही था कि पता नही कहा से कुत्ता फिर आकर भोकने लगा मै डर गया।
एक दोस्त ने कुत्ते को फिर भगाया। दरवाज़ा खुलते ही हवा के झोके से मोमबत्ती बुझ गयी। फिर उसे जलाया गया। मैंने फिर शांत भाव से उस महिला मृतात्मा का नाम लेकर अपने बीच आने को निमंत्रित किया।
अचानक मेरी ऊँगली के नीचे के ढक्कन में कम्पन हुआ । हाथ जैसे मेरे अधिकार में नही रहे। गोल घेरे में ऊँगली ढक्कन सहित घूमने लगा .......,दोस्त के रिजल्ट से संबंधित सवाल किया , मेरे हाथ की उंगली कांपते हुए कभी यस कभी नो की ओर जाने लगी।
मोमबत्ती की लाइट फड़फड़ा रही थी। फिर सवाल दुहराया गया।
अचानक मेरी ऊँगली ढक्कन सहित गोल गोल घूमने लगा। रोकते भी नही रुक रहा था .
चेहरा मेरा पसीना से लथपथ। दोस्तों की भी चेहरे में हवाइयां साफ देखि जा सकती थी।
अचानक वो कुत्ता फिर कहि से आकर रोने लगा ।
कौन है रे क्या कर रहे हो ,दोस्त जिसके मकान में थे के दादा जी की आवाज़ आई और उनके डर से हाथ की ऊँगली ढक्कन के ऊपर से हटी। और डरते डरते हम लोग अपने घर की और भाग लिये।
फिर कभी नही प्लेनचिट में आत्मा नही बुलाया। क्यूंकि लगता था की उस महिला की मृतात्मा हम लोगो से बदला न ले ले । धन्यवा
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 घनघोर   जंगलो में प्राकृतिक गुफा के भीतर  खुद बना है मंदीप गुफा   में  शिवलिंग,   ठाकुरटोला गाव  में जिसके साल में सिर्फ एक दिन एक नदी को 16 बार पार करने पर मिलते हैं दर्शन


आज से १० ,वर्ष पहले  जब मैं खैरागढ़ राजनांदगांव में पदस्थ था। लोग गर्मी के दिनों में अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को जंगल  के भीतर स्थित एक गुफा को देखने चलने की बात करते थे ।
 जिसे लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। यह जगह छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में   छुईखदान ब्लॉक  में ठाकुरटोला गाव जो की गंडई  से साल्हेवारा रोड के बीच में स्थित है।
  इस जगह में    घनघोर जंगलों  के  बीच  प्राकृतिक गुफा के भीतर  एक शिवलिंग स्थापित है।  जिसे ही  लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। निहायत ही निर्जन स्थान में गुफा के ढा़ई सौ मीटर अंदर उस शिवलिंग को किसने और कब स्थापित किया यह कोई नहीं जानता।
 आस पास  के ग्रामीणों के द्वारा कहा जाता है कि वहां बाबा स्वयं प्रकट हुए हैं। यानी शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हुआ है।जिसकी पूजा ठाकुरटोला के राजवंश के सदस्य व ग्रामवासी  लोग ही वर्ष  में  एक बार करते है। अतः
 यहां बाबा के दर्शन करने का मौका साल में एक ही दिन मिल सकता है। वो भी  अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को।
 दिलचस्प बात ये है कि वहां जाने के लिए एक ही नदी को 16 बार लांघना पड़ता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि वहां जाने का रास्ता ही इतना घुमावदार है कि वह नदी रास्ते में 16 बार आती है।

साल में एक ही बार जाने के पीछे पुरानी परंपरा के अलावा कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां भी हैं। बरसात में गुफा में पानी भर जाता है,  और रास्ते भी  काफी दुर्गम हो जाते है।  जबकि ठंड के मौसम में खेती-किसानी में व्यस्त होने से लोग वहां नहीं जाते।
 रास्ता भी इतना दुर्गम है कि सात-आठ किलोमीटर का सफर तय करने में करीब एक घंटा लग जाता है। उसके बाद पैदल चलते समय पहले पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना, तब जाकर गुफा का दरवाजा मिलता है।
साथ ही  यह घोर नक्सल इलाके में पड़ता है, इसलिए भी आम दिनों में लोग इधर नहीं आते। साथ ही वन्य प्राणियों की भी मिलने की सम्भावना भी रहती है।

हर साल अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार के दिन गुफा के पास इलाके के हजारों लोग जुटते हैं।
 परंपरानुसार सबसे पहले ठाकुर टोला राजवंश के लोग पूजा करने के बाद गुफा में प्रवेश करते हैं। उसके बाद आम दर्शनार्थियों को प्रवेश करने का मौका मिलता है। गुफा के डेढ़-दो फीट के रास्ते में घुप अंधेरा रहता है।
 लोग काफी कठिनाई से रौशनी कीव्यवस्था साथ लेकर बाबा के दर्शन के लिए अंदर पहुंचते हैं।
गुफा में एक साथ 500-600 लोग प्रवेश कर जाते हैं। अभी १५ २० वर्ष पूर्व गुफा के अंदर मशाल के और बीड़ी  की धुवा ने मधुमक्खीयो  को उत्तेजित कर दिया था और उसने काफी लोगो को काट कर घायल कर दिया था।  इसलिए अंदर काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

गुफा के अंदर जाने के बाद कई रास्ते खुलते है  , इसलिए अनजान आदमी को गुफा के अंदर  भटक जाने का डर बना रहता है। ऐसा होने के बाद शिवलिंग तक पहुंचने में चार-पांच घंटे का समय लग जाता है।
 इसलिए ग्राम के  उन व्यक्तिओ को जो प्रति वर्ष अंदर जाते रहते है लोगो के साथ झुण्ड में ही जाना उचित रहता है।
स्थानीय लोगो का  का कहना है मैकल पर्वत पर स्थित इस गुफा का एक छोर अमरकंटक में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज तक कोई वहां तक नही पहुंच पाया है।  लेकिन बहुत पहले पानी के रास्ते एक कुत्ता छोड़ा गया था, जो अमरकंटक में निकला। जबकि  अमरकंटक यहां से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर है।

Wednesday, 6 July 2016

स्थानांरण नहीं हो रहा हो तो मुक्तागिरी  के दर्शन करो ...? 

 बैतूल - मेरे पसंदीदा शहर  में से एक .. डी. के. शर्मा


वर्ष 2000 में अचानक ही मुझे बैतूल  जिला में पदस्थ किया गया। बैतूल सतपुड़ा की वादियों में मध्य प्रदेश का एक जिला है जो की  इटारसी नागपुर के मध्य स्थित है।  समीप ही स्थित रेल्वे स्टेशन बरसाली  भारत के केंद्र बिंदु है। इस जिले की खास बात है कि ये देश के बिल्कुल केंद्र में बसा है।


   बैतूल शहर तीन हिस्सों में बंटा है। मेरा कार्यालय बस स्टैंड के पास ही था तो मैंने  समीप के एक लॉज में ही रहना प्रारम्भ कर दिया क्युकी समीप ही भोजनालय और पिक्चर हॉल भी था।  साथ ही  बैतूल के बस स्टैंड में  कही भी जाने को बस मिल जाती थी। रेलवे  स्टेशन  तक जाने के लिए सस्ते मे तांगा  और आसपास में अच्छा बाजार भी   है  ।


जैसे की पहले मैंने बताया  बैतूल शहर तीन हिस्सों में बंटा है। बैतूल बाजार, बैतूल गंज( रेलवे स्टेशन के पास का इलाका) और बैतूल कोठी बाजार। कोठी बाजार बस स्टैंड के पास का इलाका का नाम  है। रेलवे स्टेशन के तरफ कल्लू  ढाना और भग्गू ढाना आदि , आदि।  

ताप्ती नदी के उदगम  स्थल
 बैतूल से 45 किलोमीटर आगे मुलताई में ताप्ती नदी का उदगम स्थल है।जिसकी भी मान्यता नर्मदा जी की ही जैसी है ,और यह नर्मदा की एक सहायक नदियों में से एक है।धार्मिक मान्यता के अनुसार मा ताप्ती सूर्यपुत्री और शनि की बहन के रुप में जानी जाती है । यही कारण है कि जो लोग शनि से परेशान होते है उन्हे ताप्ती से राहत मिलती है । ताप्ती सभी की ताप कष्ट हर उसे जीवन दायनी शकित प्रदान करती है श्रद्धा से इसे ताप्ती गंगा भी कहते है । दिवंगत व्यकितयों की असिथयों का विसर्जन भी ताप्ती में करते है । म.प्र. की दूसरी प्रमुख नदी है । इस नदी का धार्मिक ही नही आर्थिक सामाजिक महत्व भी है । सदियों से अनेक सभ्यताएं यहां पनपी और विकसित हुर्इ है । इस नदी की लंबार्इ 724 किलोमीटर है । यह नदी पूर्व से पशिचम की और बहती है इस नदी के किनारे बुरहानपुर और सूरत जैसे नगर बसे है । ताप्ती अरब सागर में खम्बात की खाडी  में गिरती है ।
 बैतूल में बने बालाजीपुरम मंदिर को   देश का पांचवा धाम कहा जा रहा है। बालाजीपुरम बैतूल रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर नागपुर हाईवे पर है । और  बस स्टैंड से 10 किलोमीटर है। हर थोड़ी देर पर बालाजीपुरम के लिए बस स्टैंड से टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां मिलती हैं। मैंने इस मंदिर का निर्माण होते देखा है।  बालाजी मंदिर पुराने नागपुर रोड पर है।बालाजीपुरम भगवान बालाजी का विशाल मंदिर के लिये प्रसिद्ध है। यह स्थान बैतूल बाजार नगर पंचायत के अन्तर्गत आता है। जिला मुख्यालय बैतूल से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 69 पर सिथत है। दिन प्रतिदिन इसकी प्रसिद्धि फैलती जा रही है। यही कारण है कभी भी किसी भी मौसम में आप इसमें जाएं श्रद्धालुओं का ताता लगा रहा है। मंदिर के साथ ही चित्रकुट भी बना है। जिसमें भगवान राम के जीवन से जुड़े विविध प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया है। मूर्तियां ऐसे बनी है जैसे बोल पडे़ं मंदिर के पीछे से फोर लेन हाईवे गुजर रहा है।
शहर के समीप ही सोनाडीह स्थित हनुमान का मंदिर ऊपर टेकरी पर है। जो की पिकनिक के लिए अच्छी जगह है। 
साफ सुथरा  रेलवे स्टेशन
सामान्य तौर  में भोपाल के दिशा से  से बैतूल आने वाली ट्रैन समय से पहली  ही आ जाती  है। ,
बैतूल का रेलवे स्टेशन काफी साफ सुथरा है। रेलवे स्टेशन के बाहर खूबसूरत उद्यान बना है जिसमें तरह तरह के फूल हैं। दूसरे दर्जे का प्रतीक्षालय भी एक दम चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। शौचालय की सफाई भी अति उत्तम है। ऐसे साफ सुथरे रेलवे स्टेशन कम ही दिखाई देते हैं।  स्टेशन परिसर में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी है जिसमें बैतूल जिले के आदिपासी डंडा नृत्य, आदिवासी गायकी नृत्य, तेजपत्ता के जंगल, सागवान के जंगल और दूसरे तरह के जंगलों के बारे में तथा मुक्तागिरी जैन तीर्थ स्थान सम्बन्धी  जानकारी दी गई है।
स्थानांणतरण नहीं हो रहा हो तो मुक्तागिरी के दर्शन करो....?   
मुक्तगिरी प्रसिद्ध जैन मंदिर है जो की उचे पहाड़ों और झरनों की बीच स्थित है। यह जगह शासकीय नौकरी करने वालो में भी अत्यन्त ही प्रसिद्ध है ,बोलते है की यदि वहां  पर जाकर कोई भी  ट्रान्सफर की अपेक्छा करता है तो वह निश्चित ही पूरा हो जाता है। यही सोचकर मई भी वह पर दर्शन के लिए गया था ,और चाहे जो भी मूल कारण हो 07 में मुझे म प से छत्तीसगढ़ से स्थानांतरण  आदेश मिल गया था ,और यही बात मेरे बाद मेरे एक मित्र ने भी बताई थी।
विकासखण्ड  भैसदेही  की ग्राम पंचायत  थपोडा में स्थित  है महान जैन तीर्थ मुक्तागिरी। मुक्तागिरी  अपनी सुन्दरता, रमणीयता और धार्मिक प्रभाव के कारण लोगों को अपनी और आकर्षित  करता है । इस स्थान पर दिगम्बर जैन संप्रदाय के 52 मंदिर है।  इन मंदिरों की तथा क्षेत्र का संबंध श्रेणीक विम्बसार से बताया जाता है। यहां मंदिर में भगवान पाश्र्वनाथ की सप्त फणिक प्रतिमा स्थापित है जो शिल्पकारी  का बेजोड नमूना है। इस क्षेत्र में स्थित  यह एक  मन कों शांति और सुख देने वाला जगह  है। निर्वाण क्षेत्र में आने वाले प्रत्येक व्यकित को यहां आकर सुकून मिलता है।

 राजा  जैतपाल बैतूल जिले में 11 वीं शताब्दी में भोपाली क्षेत्र में राज करता था। उसकी राजधानी खेड़लादुर्ग में थी। इस दुर्ग के तक्कालीन अधिपति राजा जैतपाल ने ब्रहम का साक्षात्कार न करा पाने के कारण हजारों साधु सन्यासियों को कठोर दण्ड दिया था। इसकी मांग के अनुसार महापंडितों योगाचार्य मुकुन्दराज स्वामी द्वारा दिव्यशकित से ब्रहम का साक्षात्कार कराया था तथा इस स्थान पर दण्ड भोग रहे साधु सन्यासियों को पीड़ा से मुक्त कराया था उन्होंने हजारों सालों से संस्कृत में धर्मग्रंथ लिखे जाने की परम्परा को तोड़ा। उन्होनें मराठी भाषा मे लिखें  सिन्धु की महत्ता पूरे महाराष्ट्र प्रान्त में है। यह स्थान पुरातत्व एवं अध्यात्म की दृषिट से अति प्राचीन है।
तांगा की  सरपट सरपट  दौड़

बैतूल की सड़कों में  में आज भी तांगा सरपट सरपट  दौड़ लगाता  है। वह पर मुझे  काफी दिनों  के बाद  फिर तांगे पर सफर का मौका मिला। कोठी बाजार से रेलवे स्टेशन के लिए आटो वाले 10 रुपये लेते हैं तो तांगे वाले 5 रुपये में ही  पहुंचा देते हैं।   घोड़ाडोंगरी ब्लॉक में स्थित सारणी बिजली पैदा करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
 मलाजपुर स्थित भूत भागने की जगह भी काफी प्रसिद्ध  है।  मलाजपुर में गुरूबाबा साहब का मेला प्रतिवर्ष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर तकरीबन एक माह बसंत पंचमी तक चलता है। बाबा साहब की समाधि की मान्यता है इसकी परिक्रमा करने वाले को प्रेत बाधाओं से छुटकारा मिलता है। यहां से कोर्इ भी निराष होकर नहीं लौटता है। इस वजह से मेला में दूर-दूर से श्रद्धालु आते है। मलाजपुर जिला मुख्यलाय से 42 किलामीटर की दूरी पर विकासखण्ड चिचोली में सिथत है।
 मलाजपुर में गुरूबाबा साहब का समाधि काल 1700-1800 र्इसवी का माना जाता है। यहां हर साल पौष की पूर्णिता से मेला शुरू होता है। बाबा साहब का समाधि स्थल दूर-दूर तक प्रेत बाधाओं से मुकित दिलाने के लिये चर्चित है। खांसकर पूर्णिमा के दिन यहां पर प्रेत बाधित लोगों की अत्यधिक भीड रहती है। यहां से कोर्इ भी निराश होकर नहीं लौटता है। यह सिलसिला सालों से जारी है। उन्होंने कहां कि यहा पर बाबा साहब तथा उन्हीं के परिजनों की समाधि है। समाधि परिक्रमा करने से पहले बंधारा स्थल पर स्नान करना पड़ता है, यहां मान्यता है कि प्रेत बाधा का शिकार व्यकित जैसे-जैसे परिक्रमा करता है वैसे वैसे वह ठीक होता जाता है। यहां पर रोज ही शाम को आरती होती है। इस आरती की विशेषता यह है कि दरबार के कुत्ते भी आरती में शामिल होकर शंक, करतल ध्वनी में अपनी आवाल मिलाते है। इसकी लेकर महंत कहते है कि यह बाबा का आशीष है। मह भर के मेला में श्रद्धालुओं के रूकने की व्यवस्था जनपद पंचायत चिचोली तथा महंत करते है। समाधि स्थल चिचोली से 8 किमी. दूर है। यहां बस जीप या दुख के दुपाहिया, चौपाहिया वाहनों से पहुंचा 
जा सकता है। मेला में सभी प्रकार के सामान की दुकाने सजती है

Saturday, 16 January 2016

" एक दिन जंगल के नाम  "
 "जिसने तेंदुआ न देखा उसने क्या जंगल देखा "
 मैंने बालाघाट,कवर्धा ,मंडला जिले के बॉर्डर को जोड़ने वाली , कान्हा  के बफर ज़ोन सूपखार ,बीठली के  जंगलों की वर्ष  1982 से ८५ के मध्य  अपने राजनांदगांव की ब्लॉक बोडला ,बाद में कवर्धा के पोस्टिंग के दौरान अनेको बार भ्रमण किया।   जो  की कई प्रकार के पशुओं जैसे बाघ, तेंदुआ, ढोल (जंगली कुत्ते), गौर  (बाईसन), चीतल, सांभर, चोसिंघा, जंगली सूअर आदि को रहने एवं अपना भोजन ढूँढने के लिए सहायक हैं। दूधराज, मोर, सफ़ेद पेट वाला कटफोड़वा, भूरा कटफोड़वा, क्रेस्टेड सर्पंएंट ईगल, चेंजबल हॉक ईगल, वाइट रम्प  जैसे दुर्लभ पक्षी भी  सूपखार और आसपास  के घने जंगल में  बहुतायत से मिलते है। सूपखार में रुकने के लिए कई जंगल विभाग के विश्रामगृह  बने हुए है जो की तब वाइल्डलाइफ सफारी के लिए आने वाले मेहमानों को न सिर्फ ठहरने की अच्छी व्यस्था बल्कि अच्छे खाने  की सुविधा भी उपलब्ध करते हैं। और तब  कलेक्टर /कमिश्नर और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियो को  को ठहरने के लिए जंगल में एक अच्छी व्यस्था थी।  एक दिन हम वहां  के भ्रमण में परिवार के साथ अपनी बंद जीप में निकले / जँगल  प्रारम्भ होते ही   नदी के किनारे की ताज़ी हवा मिल जाने से हम लोग पहले की बड़े खुशी  महसूस कर रहे थे। चिल्फी  से निकलते समय मुहँ अँधेरे में ही ड्राईवर ने कुछ आवाज़ें सुनकर गाड़ी रोक दी  .देखा तो तेंदुआ  था। तेंदुआ, बेहद खूबसूरत जानवर होता है, उसकी ताकत और शान देखते ही बनती है। बाघ के विपरीत तेंदुए की चमड़ी पीलापन लिए हुए होती है और उस पर काले भूरे बेतरतीब रिंग्नुमा निशान होते है। तेंदुआ आमतौर पर छोटे जानवरों का शिकार करता है जैसे हिरन, जंगली सूअर के बच्चे, लंगूर। कहते है की  अपने शिकार को अन्य बड़े शिकारियों से बचाने के लिए तेंदुआ उसे पेड़ के शाखों के बीच छुपा देता है और वहीं बैठ कर आराम से खाता है। लेकिन मुझे ऐसे देखने का अवसर नही मिला।  एक बार शिकार करने के बाद कई दिनों तक वह उसी शिकार को खाता है और करीब ४-५ दिन बाद अगला शिकार करता है,  बेहद खूबसूरत जंगल के बीच हम लोग धीरे धीरे चल रहे थे की तभी दायीं तरफ से बांस की शाखों के चटखने की आवाज़े आई, हम उत्साहित होकर बांस के झुरमुट की तरफ देखने लगे, वहां एक हिरन का छोटा बच्चा था जो झाड़ियो  की पत्ती खा रहा था, हमे देख कर वो पीछे हट गया.  एकदम से बांस बांस के झुरमुट  में काफी हलचल शुरू हो गयी और ध्यान से देखने पर समझ में आया की यह तो  छोटे बड़े हिरणो  का एक पूरा झुण्ड है।  उन को देख लेने लेने के बाद हम फिर और जानवरो  की तलाश में निकल पड़े। तभी वह के पानी के तालाब के पास हमने  बंदरों का समूह देखा जो पानी पीने आया था, दुधमुहे छोटे बच्चे अपनी अपनी माँ से चिपके हुए थे और थोड़े युवा बच्चे एक दुसरे को पकड़ने के खेल में मस्त थे। पूरा समूह जोश से भरा हुआ उचल कूद कर रहा था। हमने ध्यान से देखा तो एक बन्दर एकदम ध्यान भरी मुद्रा में सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठा सारे जंगल की निगरानी कर रहा था, वो सामान्य लग रहा था पर वो दूसरी दिशा में बड़े ध्यान से कुछ देख रहा था, हमने भी वहीँ रुकने का फैसला किया ताकी हम जंगल से आ रही आवाजें सुन सके और वह की मूवमेंट को समझ सके। कुछ ही मिनिट बीते होंगे के वो बन्दर बैचन होकर "ख़र्र खो खो" ऐसी आवाज़े निकलने लगा जिसका साफ़ मतलब था की वो अपने समूह को जंगले की तरफ से आते खतरे से सचेत कर रहा था, इसे अलार्म कॉल करते हैं। तभी २ और नर बन्दर ऊँचे पदों पर चढ़ गए और चिल्लाने लगे, पूरा समूह क्षण भर में पेड़ पर चढ़ गया और पीछे की तरफ भागने लगा, हम जंगल के इन पहरेदारों को ध्यान से देख रहे थे ताकि कुछ अनुमान लगा सके की वो जंगल के किस शिकारी पशु को देख कर घबरा रहे हैं। बंदरो की चीख पुकारों के साथ ही साथ कुछ सीटी बजने जैसी तीखी आवाज़े भी सुनाई देने लगी, अफसर को समझते देर न लगी की जंगली कुत्तो का एक झुण्ड शिकार की तलाश में हमारी तरफ आ रहा है। जंगली कुत्ते भी जंगल में कम ही दिखाई देते है। उस झुण्ड में ९ सदस्य थे, पूरा झुण्ड तालाब के पास आया और पानी पीने लगा। कुत्तों का झुण्ड १५ मिनिट तक पानी पीने के बाद वापस जंगल की तरफ लौट गया। हमने हमारी किस्मत को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गये। मेरे बर्ड के शौक के कारण रास्ते भर मैं पक्षी देखता हुआ चल रहा था। . मैंने रास्ते में कई सुन्दर पक्षियों से भेट हुआ।   उनमे सबसे अच्छा था  कटफोड़वा, ये पक्षी सिर्फ  भारत के जंगलो में ही पाये जाते है। कटफोड़वा एक पेड़ के तने में अपनी चोंच से कीड़ो को निकाल निकाल कर खा रहा था। विश्राम गृह  का  छेत्र सबसे खूबसूरत इलाका है, यहाँ कई जानवर  नदी में पानी पिने आये हुए थे और नदी किनारे की नरम घांस को चर रहे थे, इन जानवरों में गौर  का एक बड़ा झुंड, चीतल, सांभर के कई छोटे छोटे झुण्ड काफी आकर्षक लग रहे थे। हमने मन भर कर प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों की  जी भर कर निहारा।  । किन्तु बाघ , तेंदुआ न देख पाने का दुख अब तक जा चुका था।  वापस जाते समय मैंने वही पास ही में एक दूधराज पक्षी देखा। अत्यंत दुर्लभ दूधराज सफ़ेद रंग का बुलबुल के आकार का पक्षी होता है जिसकी लम्बी सफ़ेद पूँछ होती है और हवा में उड़ते समय किसी रिबन की तरह लहराती है।  हम तैयार होकर वापस जंगल की तरफ निकल पड़े और जंगल की शांति को चीरती हुई ग्रे जंगल फाउल की कर्कश ध्वनि सुनते हुए धीरे धीरे आगे जाने लगे।  जीप  में हमारे साथ  २ युवक  और भी थे, उनमे से एक पहली ही बार जंगल आया था और अति उत्साहित था,  चलते चलते एक मोड़ मुड़ते ही वो चकित होकर पीछे की और देखकर "टाइगर टाइगर" चिल्लाने लगा। हम सब ने पीछे देखा तो एक बड़ा सा नर तेंदुआ झाड़ियों में अन्दर की तरफ जा रहा था।  हम कई मिनट तक उसे झाड़ियों के पीछे जाते हुए देखते रहे और आज क्या कमाल का दिन है यह सोचने लगे, आज सुबह से हम , ढोल, हिरन, सांभर, बाईसन ये सभी जंगल के प्रमुख जानवर देख चुके थे ।  २ बार लंगूरों और चीतल की अलार्म कॉल भी सुनी देखा  एक बड़ा नर तेंदुआ  रोड पर बिलकुल सड़क किनारे बैठा हुआ था। खूबी है तेंदुए की जो उसको घोस्ट ऑफ़ द जंगल बनाती है। तेंदुआ अपनी खाल के रंग और चुप कर बैठने के तरीके से पर्यवेश में इतना घुल मिल जाता है की पुराने वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स भी आसानी से उसे देख नहीं पाते। रस्ते में एक फारेस्ट गार्ड मिला, वो  साइकल  लेकर पैदल ही जंगल में गश्त लगा रहा था। इन्ही गार्ड्स की मेहनत, जंगल के ज्ञान और जोखिम लेने के कारण ही आज भी जंगल और उनमे रहने वाले जानवर बचे हुए है। ये गार्ड्स २ ४ घंटे जंगल में रहते हैं और शिकारियों और लकड़ी चुराने वाले बदमाशों को जंगल से खदेड़ते रहते हैं। गार्ड ने हमे बताया की अभी ५ मिनिट पहले नजदीक तालाब  की तरफ से चौसिंघा की अलार्म कॉल आ रही थी। चौसिंघा काफी छोटा हिरन प्रजाति का जानवर होता है और इसकी अलार्म कॉल सबसे पक्की होती है। हम गार्ड के बताये हुए इलाके की तरफ तेज़ी से चलने लगे। रस्ते में एक मादा भालू और उसके बच्चे ने हमारे सामने से सड़क पार की और जंगल में भाग गये। और शाम ढलने लगी थी।  अँधेरा होने लगा था और वापस लौटने का समय हो चला था। जंगल से बाहर की तरफ आते समय हमने चिल्फी  घाटी एरिया में देखा की एक जीप  सड़क के एक तरफ खड़ी थी और लोग  वह  पर खड़े होकर  खतरे की परवाह किये बगैर सामने  उची टीले पर कुछ देख रहे थे। हम भी उस तरफ जीप के भीतर से ही  देखने लगे। जब हमने वह देखा तो हमारे आश्चर्य की सीमा न रही, ऐसा लगा मानो हमारी इच्छा तेंदुए ने सुन ली थी और हमे दर्शन देने फिर  पहुच गया था, तभी एक ट्रक की आती आवाज़ ने उसे वह से भगा दिया  और हम  वापस अपने क़्वार्टर की तरफ लौट चले। वापस आने पर ऐसा लगा  मानो  इस एक दिन में सारे जंगल की सैर हो गयी