Thursday, 27 November 2014

 अमरकण्टक मेरी यादो में से 
   देवेंद्र कुमार शर्मा सुंदरनगर रायपुर छ। ग 

  अमरकण्टक मध्य प्रदेस  के अनूपपुर जिले  में आता हैं।  यह जिला   डिण्डोरी म.प, और  छत्तीसगढ  राज्य  के बिलासपुर जिले  के पेण्ड्रा रोड नामक रेलवे स्टेशन से भी  उतर  कर जाया जा सकता है। 
पेण्ड्रा से  बस  के रास्ते  में केवची  नमक गाव  से होते हुए भी जंगल पहाड़ के बीच घाट  वाले  रस्ते से चढ़ते हुये भी पंहुचा जा  सकता है।

वर्ष 85  में पहली बार मै  मुंगेली से तखतपुर और वहा से करगीखुर्द की और मूड़ कर अचानकमार जंगल में  से होते  हुये छपरवा विश्रामगृह तक पहुंचे थे। फिर वहा  में कुछ देर आराम कर आगे बढ़े थे। इसके बाद २,3 बार  और वहा  जाने का अवसर तो प्राप्त हुआ है।  किन्तु अब  वहा  कि प्राकृतिक छबि को और पेड़ -पौधे  जीव जन्तुओ  का नाश होते  देख दुःख होता है।

 छत्तीसगढ़  निर्माण  के बाद अब अचानकमार एरिया को  रिजर्व फ़ारेस्ट में परिवर्तित कर दिया गया है। अमरकंटक में  मंदिरो की भरमार और पक्के  निर्माण  कार्यो ने नर्मदा जी के उद्गम  स्थल कुण्ड  को और माई  की बगीया  स्थल की गुले बगावली , बूटी ,केवड़े के  पौधो  को काफी नुकसान  पहुचाया है। अमरकंटक में नर्मदा जी के मंदिर ,सोनमुड़ा  सोन , जोहुला नदी के उद्गम स्थल कपिलधारा  जलप्रपात ,दूधधारा जलप्रपात ,कबीर चबूतरा ,व् विभिन्न  आश्रम ही पहले देखने योग्य जगह थे। 
वर्तमान में अनेको मंदिर ,और आधुनिक आश्रम ,होटल आदि निर्मित है।

  नर्मदा जी  विश्व की सर्वाधिक प्राचीन नदियों में से एक और हमारे देश की सबसे प्राचीन प्रमुख नदी है ।  आज जहाँ  नर्मदा घाटी है कभी यहाँ तक अरब सागर का विस्तार था और यही वो स्थान हैं जहाँ करोड़ों वर्ष पूर्व अफ्रीका महाद्वीप से टूटा हुआ  हिस्सा भारत से आकर जुड़  गया।   कपिलधारा जल प्रपात   -

 नर्मदा अपने छोटे से उद्गम कुण्ड से  यात्रा आरम्भ करती है और जो धारा कपिलधारा तक जाती है उसका विस्तार बहुत ही कम है परन्तु सौंदर्य अद्भुत है ।

 नर्मदा के उद्गम स्थान से लगभग 6 किलोमीटर दूर ये जलप्रपात स्थित है । कहा जाता है कि कभी यहीं अमरकंटक नगरी थी । यहां नर्मदा 100 फुट गहरे खड्ड में गिरती है । दुर्गम चट्टानों से होकर एक मार्ग भी प्रपात के निचले हिस्से तक जाता है । नर्मदा अपने छोटे से उद्गम कुण्ड से  यात्रा आरम्भ करती है और जो धारा कपिलधारा तक जाती है उसका विस्तार बहुत ही कम है परन्तु सौंदर्य अद्भुत है । पहाड़ के नीचे उतरकर हि  इसके संपूर्ण दर्शन किये जा सकते हैं । नीचे पानी के गिरने के स्थान पर एक खोह है जहां जल प्रपात के पीछे  तक भी जाया जा सकता है ।जल प्रपात की ध्वनि पूरी घाटी में गुंजायमान होती है । कुछ दूर चलकर ही दुग्धधारा नामक स्थान है। यहा पर गिरने वाली धारा सफ़ेद  दूध जैसी दिखती है। यहा पर स्नान से शरीर  की अच्छी मालिश भी हो जाती हैं। यहां पर नर्मदा की पतली जलधारा दुर्गम पहाड़ियों और वनों में खो सी जाती है ।  व यहां का प्राकृतिक सौंदर्य मन को लुभाता है ।मुझे उसी समय की याद है जब हम लोग कपिलधारा स्थल से ऊपर से नीचे की और जाने लगे तभी कुछ लोगो की आवाज़ कानो  में सुनाई पड़ी , रुको ,आगे मत जाओ ,हमने पूछा क्या हुआ। तभी हमने देखा कि कई लोग आँखों  ,होठो ,चेहरा सूजे हुए  लोग हमारी ओर दर्द से कराहते  बढ़ते चले आ रहे हैं। हम लोग समझ गये कि उनपर मधुमक्खीयो  का हमला  हुआ है। वे लोग बसो में बैठकर बिलासपुर रेलवे कॉलोनी से पिकनिक मनाने आये हुये थे ,कपिलधारा जलप्रपात के ऊपर बड़े -बड़े मधुमक्खियों के  डेरा था। किसी ने शरारत से उनपर पत्थर फेक दिया था ,जिससे की वे बिफर गए थे। और इनके कोपभाजन का सबसे अधिक शिकार एक सिगरेट  पीने  वाला व्यक्ति शुरू में बना। वह व्यक्ति इतना अधिक घायल था की उसे जैसे तैसे सहारे से ऊपर सुरक्षित जगह में ले जाया गया था। हम लोग बच्चो सहित रुक गये। और जब वीरानी सी छा गई तो नीचे सावधानी पूर्वक उतर कर दूधधारा की ओर जंगल के रास्ते से बढे। उन पर्यटकों में से अधिकांश बंगाली परिवार से थे में से जो  जो कि पहले उपर चढ़ गये थे ,वे हि  सुरक्षित थे। नही तो सभी को मधु मक्खियों ने  अच्छा प्रसाद दिया था।
 दूधधारा जल प्रपात 
दूधधारा- अमरकंटक में दूधधारा नाम का यह झरना काफी लो‍कप्रिय है। ऊंचाई से गिरते इसे झरने का जल दूध के समान प्रतीत होता है इसीलिए इसे दूधधारा के नाम से जाना जाता है।,कपिलधारा जलप्रपात से नदी के किनारे किनारे के रास्ते होते हुये पत्थरो के ऊपर कूदफाँद  करते हुये ह्म लोग दूधधारा जलप्रपात तक  पहुंच कर  उस रमणीय  स्थल में  स्नान ध्यान में लग गये। और स्नान ख़त्म कर बॉस  के बने मचान नुमा सीढ़ी से ऊपर चढ़े तो  अचानक हमारी  नज़र एक छोटी  सी गुफा  और उसके ऊपर  लिखे दुर्वासा मुनि जी  के आश्रम वाली  बोर्ड पर पड़ी। और धर्मग्रंथो में उनके सम्बन्ध  में लिखे किस्से कहानिओं  को याद कर आतंकित  होकर उनकी मूर्ति से  छमा याचना  कर आगे बढे। यहाँ पर पाये जाने वाले  कीट , फंगस ,फ़र्न और अन्य  जड़ी बूटीआ  अन्य जगह की अपेक्छा  बहुत अच्छी  तरह से विकसित  दिखी। 
सिर  कटी हुई गजसवार 
 नर्मदा मंदिर समूह और उद्गम के मध्य पाषाण निर्मित सिर  कटी हुई गजसवार  की मूर्ती ,अश्व सवार ,सती प्रथा सूचक अनेको मुर्तिया स्थापित है। हाथी की 4 पैर वाली प्रतिमा के साथ आसपास के पुजारी -पण्डो  ने लोगो को भ्रमित कर दान दक्षिणा ऐंठने का अच्छा माध्यम खोज लिया है।
जब हम लोग वह पहुंचे तो क्या देखते है की बिलासपुर से आये उन  बंगाली परिवार में से एक के पुत्री और पत्नी हाथी  के पैरो के बीच से निकल कर पंडित को पैसे देकर धर्मात्मा घोषित हो चुके है। और अब वे तथा पंडित अपने मोटे से शरीर के पतिदेव को हाथी प्रतिमा  के पैरो के बीच से निकल कर धर्मात्मा  और ,किस्मतवाला कहलाने उकसा रहे थे।पंडितअलग उकसा रहा था , ताकि उनकी दान दक्षिणा इन  पुण्यात्माओं  से प्राप्त हो सके। गज  प्रतिमा के साथ किंवदन्ति जुड़ी हुई है कि इसके पैरो में मध्य से सिर्फ़ धर्मात्मा ही निकल सकता है चाहे वह कितना ही मोटा हो। अगर कोई पापी रहे तो पतला भी इसमें फ़ंस जाता है। बस क्या था वो मोटा आदमी पैरो के नीचे घुस तो गया किंतु बाहर नही निकल पा रहा था। ब्लड प्रेशर का शिकार भी था। परेशान होकर उसने हाथपैर डाल  रखें थे। पत्नि और पुत्री रो रही थी।  उकसा रहे लोग गायब हो चुके थे। बिचारे तमासबीनो  क मुफ्त  मनोरन्जन करते हलाकान थे। फिर लोगो की सलाह पर साबुन घोळ कर उड़ेले गये ,तभी वहा के कुछ पुराने व्यक्ति आ गये ,जिन्होंने उन्हें हिम्मत बंधा कर गाइड किया ,और वो ले- देकर जैसे तैसे बाहर  निकल ही आये। किन्तु इस दौरान उनके  हाथ  पैर पाकर करखिचने  पत्नी और पुत्री के द्वारा की कोशिस में पीठ छिल  भी चूका था।  वास्तविकता    में वहाँ  से  निकलने की टेकनिक है। वह व्यक्ती मोटा  होने से उसका पेट  हाथी  के पैरोँ के बीच फस गया था।  कुछ लोग  भय से ही हाथी  के प्रतिमा की  पैरों से निकलने का प्रयास हि  नहीं करते।    यद्यपि   मै दुबला हु ,किन्तु पता क्यों इस तरह की बात में विश्वास  नही  है ,और ऊपर वाली घटना भी एक कारण  हो सकता है।
सोन मुडा  – यह सोन नदी का उद्गम माना जाता है । अममरकंटक पर्वत से सोन की पतली धारा एक दलदली प्रदेश से निकलकर वनखंडी में अदृश्य हो जाती है । सोन नदी का वर्णन आर्यों औऱ मेगस्थनीज ने “ हिरण्याह “ नाम से किया है । इसकी जलधारा में सोने के कण मिलने के कारण ही इसका नाम सोन पड़ने की भी किवदंती है । सोन का उल्लेख ब्रम्हपुराण, बाल्मिकी रामायण औऱ भागवत में भी मिलता है । एक जनश्रुति के अनुसार सोन का विवाह नर्मदा से निश्चित हुआ था किंतु नर्मदा को किसी अन्य स्त्री के साथ सोन के प्रेम संबंध का पता चल गया और उसने विवाह करने से इंकार कर दिया औऱ फिर वह विपरीत दिशा में प्रवाहमयी हो गईहै। 
 मां की बगिया- मां की बगिया माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी-भरी बगिया से स्‍थान से शिव की पुत्री नर्मदा पुष्‍पों को चुनती थी। यहां प्राकृतिक रूप से आम,केले और अन्‍य बहुत से फलों के पेड़ उगे हुए हैं। साथ ही गुलबाकावली और गुलाब के सुंदर पौधे यहां की सुंदरता में बढोतरी करती हैं। यह बगिया नर्मदाकुंड से एक किमी. की दूरी पर है।
  (चित्र गूगल ,व् अन्य    ब्लॉगर  साथियो  से साभार लिया गया है )              

Tuesday, 11 November 2014

जगत जननी माँ ज्वालादेवी सोनपुर ग्राम पाटन
ब्लॉ  . देवेन्द्र कुमार शर्मा 

खारून नदी के तट पर सोनपुर ग्राम बसा हुआ है। यहाँ के 2 शिवलिंग एवं जगत जननी माँ ज्वालादेवी की इस अंचल में काफी ख्याति है छत्तीसगढ़ मातृ प्रधान प्रदेश है माता के नाम से पुत्र की पहचान भी इस प्रदेश की विशेषता है।,यहा गाँव -कस्बो से लेकर बड़े शहरो तक देवी माँ की विभिन्न नामो में मंदिर और उनमे स्थापित मुर्तिया मिलेगी। मुख्यतः माँ महामाया ,कंकलिन , काली माता ,शीतला देवी ,स्थानीय  गाव ,कसबे के अनुसार नामो में अलग अलग नामो जैसे माँ बम्लेश्वरी ,चंडी ,बिलाई माता ,दंतेश्वरी ,अंगारमोती ,सती,सात  बहनिया,धुमा देवी समलेश्वरी ,भवानी माता आदि  और जंगल पहाड़ की घाटीओ बंजर जगह में बंजारी माता आदि आदि के नामो से लोगो के जीवन में जगह बनायीं हुई है। गौरी गणेश की पूजा का विशेष महत्व ,तथा इनके नाम  पर तीज -त्यौहार  विभिन्न जातियों में आपस की  दोस्ती को बदना बद कर रिश्ते दारी में तब्दील करना  व् कई पीढ़ीओ  तक  भी निभाना ,जश गीत ,रामायण को अलग तरह की शैली में पड़ने की लोक  परंपरा ,इस छेत्र की विशेषता है। दुर्ग जिले के पाटन ब्लॉक के रायपुर सीमा से लगा प्राचीन ग्राम तरीघाट से जहा की संस्कृती सिरपुर से भी प्राचीन माना जाता है ,से ही जुडी हुई ग्राम है   सोनपुर। पाटन से रायपुर मार्ग पर 4 किमी दूर


  खारून नदी के तट पर सोनपुर ग्राम बसा हुआ है। यहाँ के 2 शिवलिंग एवं ज्वालादेवी की इस अंचल में काफी ख्याति है

खारून नदी का  उद्गम

 रायपुर से जगदलपुर राजमार्ग पर लगभग 101 किमी दूर अथवा धमतरी से 24 किमी की दूरी पर मरकाटोला ग्राम के दाहिनी औऱ फोरेस्ट बैरियर से ढाई किमी दूर ‘कंकालिन शक्ति-पीठ’ स्थित है। यह शक्ति-पीठ बियावान जंगल में एक पथरीली चट्टान पर है। शक्ति-पीठ की बाँयीं ओर उथला जल स्थान है। कंकालिन शक्ति-पीठ से एक नाला निकलता है, जो कंकालिन नाला के नाम से जाना जाता था।

 खारून नदी

लगभग 100 कि.मी. आगे नाले में एक पाताल फोड़ जल-स्रोत है, जहाँ बारह महीनों पानी प्रवाहित होता रहता है और यहाँ पानी का एक कुंड बन गया अपने उद्गम स्थल से 13 किमी. आगे चलकर कंकालिन नाला कुलिया ग्राम में पहुँचकर देवरानी-जेठानी नाला कहलाता है। कहा जाता है कि किसी देवरानी-जेठानी के रूप में दो स्त्रियाँ इस नाले में स्नान करते हुए डूब गई थीं और तभी से इस नाले को ‘देवरानी-जेठानी’ नाला कहा जाने लगा। कुलिया ग्राम से 25 किमी दूर किकिरमेटा ग्राम से 4 किमी पहले इस नाले में तर्री नाला का संगम हुआ है और तर्री नाला का उद्गम संगम से 28 किमी. दूर ग्राम बरपारा के जंगल से हुआ है। इन्हीं दो नालों की धारायें आगे चलकर 5 या 6 किमी दूर किकिरमेटा पहुँचती हैं और यहाँ नाले का नाम देवरानी-जेठानी नाला विलोपित होकर खारून नदी के रूप में परिवर्तित हो गया है।आगे आते है तो नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है।

प्राचीन नगर के अवशेष 

 परसुलिडीह गॉव के सामने नदी के पार को देखने से  से ही  उस पार बड़े बड़े 


टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। खुदाई के दौरान  इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जा रहे है। जो कि इस बात को  सिद्ध करता  है. कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी।पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई के दौरान  यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं। ग्रामीणों ने यहाँ प्राचीन.महामाया का मंदिर बना रखा है,कुछ  बसाहट पुराने किले की तरह है , पत्थर इस बात को इशारा करते है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। जहा से पहले परिवहन के लिए नाव और छोटे जहाज भी आते जाते रहे होंगे।  तरीघाट में इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट  रही होगी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते रहे होंगे। पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई के दौरान  दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ  दैनिक उपयोग के  मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं।

रायपुर के पास कुम्हारी के बीच  खारून नदी में बना पूल 

रायपुर के पास खारून नदी में बना पूल 

छत्तीसगढ़ की खारून नदी का भी अपना एक अलग सांस्कृतिक इतिहास है। वैसे देखा जाये तो ग्राम सोनपुर और लामकेनि गाव के बीच यहाँ खारून नदी का पाट काफी चौड़ा लगभग एक किमी चौड़ा है सोनपुर का एक शिवलिंग 5 फीट का है जो खारून नदी की मध्य धार में रेत के नीचे दबा हुआ मिला था। और दूसरा समीपस्थ बावड़ी में प्राप्त शिवलिंग साढ़े तीन फीट


ऊँचा है और यह ज्वालादेवी के मंदिर के पास  एक बावड़ी मध्य से प्राप्त हुआ था दोनों शिवलिंगों के ऊपर का तिहाई भाग गोलाकार है और बाद का भाग चौकोर है। नवरात्रि के समय ज्वालामुखी के मंदिर के पास कुंड में देवी के जँवारों की पूजा अर्चना की जाती है। तत्पश्चात जँवारों को खारून नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। जहा की मूल संस्कृती हिमाचल प्रदेश ,उत्तरप्रदेश ,व् आसाम से आये लोगो से ही स्थापित है। क्युकी शायद ये पहला गाव है ,जहा की माँ ज्वाला देवी ,माँ गौरी कमाक्छ्या देवी के नाम से मुर्तिया मंदिर में स्थापित है। तथा यहाँ पर रहने वालो में इनके प्रति अत्यंत श्रद्धा है।यहा की माता जी की मूल मूर्ती मिट्टी से बनी हुई है ,और वो भी ग्राम सोनपुर   के  ही एक कुम्भकार परिवार के द्वारा ही निर्मित है।  बाबा गोरखनाथ ,व् मछंदरनाथ जी को भी मानने वाले जो की उड़ीसा ,आसाम से जुड़े हुए लोग भी रहते है ,मिट्टी के बर्तन इस गाव में बने मिट्टी के बर्तन की ख्याति भी दूर दूर तक है। इस पेशा से जुड़े लोग भी है। यह गाव भी पूर्व में स्थापित सभ्यता के अनुसार नदी के किनारे ही बसा हुआ है।ग्राम देवता, मँझलागोटिया ,शीतला मंदिर भी है। हम लोग भी इसी नदी के आँचल में खेलते -कूदते हुए ही बड़े हुए है।इस गाव की और कई विशेषताए है पवित्र खारून नदी इस गाव की जीवनदायिनी है।खारून नदी दुर्ग व रायपुर जिलों की सीमा का निर्धारण करती है तथा अपने संगम स्थल पर यह बेमेतरा एवं बलौदा बाजार तहसीलों को भी एक दूसरे से विभाजित करती है।

(खारून नदी और शिवनाथ नदी के संगम स्थल में स्थित सोमनाथ टेम्पल छत्तीसगढ़ )

हिमाचल स्थित ज्वाला देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि माना जाता है. जब भगवान शिव माता सती को कंधे पर उठाकर इधर-उधर घूम रहे थे, तब माता का जिह्वा इसी स्थान पर गिर पड़ा था. कहते हैं मां शक्ति के इस मंदिर में 9 ज्वालाएं प्रज्वलित है, जो कि 9 देवियां महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती, अन्नपूर्णा, चंडी, विन्धयवासिनी, हिंगलाज भवानी, अम्बिका और अंजना देवी की स्वरुप हैं. मां ज्वाला देवी के मंदिर में अनवरत रूप से प्राकृतिक ज्वाला प्रज्वलित होती रहती है. मान्यता है कि जो मनुष्य सत्यनिष्ठा के साथ इस रहस्यमयी शक्तिपीठ आता है, उसकी कामना अवश्य ही पूर्ण होती है. एक प्रचलित दन्त कथा के अनुसार सतयुग में महाकाली के परमभक्त राजा भूमिचंद को देवी ने स्वप्न दिया और अपने पवित्र स्थान के बारे में बताया, तब राजा भूमिचंद स्वयं उस स्थान पर गए जहां उन्हें माता ज्वाला देवी की ज्वाला का दर्शन हुआ. तब उन्होंने वहां पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और शाक-द्वीप से भोजक जाती के ब्राह्मणों को बुलाकर माता की पूजा के लिए नियुक्त किया. उन दोनों ब्राह्मण का नाम पंडित श्रीधर और पंडित कलापति था. कहते हैं उनके वंशज ही आज भी माता की पूजा करते हैं. नवरात्र के समय में यहां बहुत भीड़ रहती है परन्तु आस्थावान भक्त इस समय माता के दर्शन को अवश्य आते हैंहै शेष अगले भाग में ,,...जिसमे अनेको मनोरंजक व् नयी बाते आपको मिलेगी ?.  मेरे ब्लॉग jiwan ke aneko rang में 

छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृतिओ के साथ पड़ा जा सकता है शीघ्र ही माँ 

ज्वालादेवी ,खारून नदी के तट के प्रसिद्ध स्थल,छत्तीसगढ़ में टोनही प्रथा 
और भूत प्रेत पर कहानी पड़ना हो तो मेरे ब्लॉग में पढ़े. आप भी मैटर 

आपके नाम से प्रकाशित करने भेज सकते है ,मुझे। .....,,,,,,,,,,,,,,,,,,



जलती रहेगी गोरखनाथ के इंतजार में मां की ज्वाला 

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच बसा है ज्वाला देवी का मंदिर। मां ज्वाला देवी तीर्थ स्थल को देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है। शक्तिपीठ वह स्थान कहलाते हैं जहां-जहां भगवान विष्णु के चक्र से कटकर माता सती के अंग गिरे थे। शास्त्रों के अनुसार ज्वाला देवी में सती की जिह्वा गिरी थी। मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों में देवी हमेशा निवास करती हैं। शक्तिपीठ में माता की आराधना करने से माता जल्दी प्रसन्न होती है।

ज्वाला रूप में माता 

ज्वालादेवी मंदिर में सदियों से बिना तेल बाती के प्राकृतिक रूप से नौ ज्वालाएं जल रही हैं। नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला जो चांदी के जाला के बीच स्थित है उसे महाकाली कहते हैं। अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं।
 मां ज्वाला देवी शक्तिपीठ के
ज्वाला को बुझा न सका अकबर 
कथा है कि मुगल बादशाह अकबर ने ज्वाला देवी की शक्ति का अनादर किया और मां की तेजोमय ज्वाला को बुझाने का हर संभव प्रयास किया। लेकिन अकबर अपने प्रयास में असफल रहा। अकबर को जब ज्वाला देवी की शक्ति का आभास हुआ तो अपनी भूल की क्षमा मांगने के लिए अकबर ने ज्वाला देवी को सवामन सोने का छत्र चढ़ाया।

ज्वालादेवी की ज्योति 
ज्वाला माता से संबंधित गोरखनाथ की कथा इस क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। कथा है कि भक्त गोरखनाथ यहां माता की आरधाना किया करता था। एक बार गोरखनाथ को भूख लगी तब उसने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं। माता आग जलाकर बैठ गयी और गोरखनाथ भिक्षा मांगने चले गये।

इसी बीच समय परिवर्तन हुआ और कलियुग आ गया। भिक्षा मांगने गये गोरखनाथ लौटकर नहीं आये। तब ये माता अग्नि जलाकर गोरखनाथ का इंतजार कर रही हैं। मान्यता है कि सतयुग आने पर बाबा गोरखनाथ लौटकर आएंगे, तब-तक यह ज्वाला यूं ही जलती रहेगी।

गोरख डिब्बी
ज्वाला दवी शक्तिपीठ में माता की ज्वाला के अलावा एक अन्य चमत्कार देखने को मिलता है। मंदिर के पास ही 'गोरख डिब्बी' है। यहां एक कुण्ड में पानी खौलता हुआ प्रतीत होता जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है।




Thursday, 6 November 2014

जिंदगी खुली आँखों में
devendra kumar sharma

सुंदरनगर रायपुर छ ग 

एक बच्चा ट्रैन में सफर कर रहा था ,जो की खिड़की के पास बैठा हुआ था। और जो भी चीज़ उसे दीखता वो चिल्ला पड़ता। वो देखो पापा पहाड़ पापा पापा वो पेड़ ,वो देखो गाय. आदि आदि। पडोसी ने पूछा की क्या बच्चा मंद बुद्धि का है जो की छोटी छोटी बातो को देख कर उत्सुकता से चिल्ला उठता है। पिता ने कहा इसकी आँखे जन्म से बंद थी आज ऑपरेशन के बाद पहली बार अपनी जीवन में आखो से दुनिया देख रहा है। और पडोसी की आँखों में अपने कथन के लिए आँखे भर आई। कहने का मतलब बिना जाने दूसरे को उसपर कमेंट करने से पहले विचार कर व् कारण जान कर ही बोलने चाहिए।

Sunday, 2 November 2014


" संविदा कर्मचारी ,की दिहाड़ी मज़दूर  ,, 


,हाय रे मेरी किस्मत तू मुझे कहा ले आई ,
छोड़ कर सारी दुनिया मुझे ट्रेनिंग देना ही भाई,,,
अपने नसीब की गुल्लक मैंने खुद ही तुड़वाई 
सोचा था मिलेगा रुपैय्या ,पर हाथ चवन्नी ही आई ,,
अपनी पूरी जवानी को इसके बढ़ाने में लगाई ,
न देखा दिन न देखा रात न ही कोई ख़ुशी मनाई ,,
सबसे ज्यादा काम करके भी मिली न पूरी कमाई
कम वेतन पर ही खुश रहकर मैंने ईद और दिवाली मनाई ,
परमानेंट का सपना देख देखकर,दिल में एक आस जगाई ,
अब बनूँगा ,अब बनूँगा ये सोच सोच कर रात बिताई ,,,
पर देखो रे मेरी किस्मत आज तक नही बदल पाई ,
इस निकम्मी संस्था ने कर दी मेरी जग हसाई ,,,
हाय रे मेरी किस्मत हाय हाय तू मुझे कहा ले आई ,
छोड़ कर सारी दुनिया तुझे ही मै क्यों भाई,,,,,,,?

मेरे कुछ मित्रगण जो की संविदा कर्मचारी है ,की दिहाड़ी ,, ख़ुद नही समझ पा रहे है को समर्पित 
उनके फरमाइश पर लिखी कविता है ,जिसका उद्देश्य किसी का मज़ाक उड़ाना ,या अपमानित
 करना नही समझा जाये .............,,,?

Saturday, 1 November 2014

 अंग्रेज अफसर कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के बारे में, जिन्होंने गांव को ठगों ,पिंडारियों से आजाद कराया था।

 देवेन्द्र कुमार शर्मा 

 ये है 931 कत्ल करने वाला बेरहम ठग, अंग्रेज अफसर ने दी थी इसे मौत


भोपाल। भारत में ब्रितानिया हुकूमत के समय खुलेआम हिंदुस्तानियों को फांसी देने वाला एक क्रूर अंग्रेज अफसर उस इलाके का राबिनहुड बन गया। सुनने में यह बात जरूर अटपटी लगती है पर है सोलह आना सच। यह बात मध्यप्रदेश के कटनी शहर में ब्रिटिश शासन के अंग्रेज अधिकारी कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के लिए बिल्कुल सही हैं। इतना ही नहीं इस अंग्रेज अफसर के नाम से कटनी जिले में एक छोटा सा कस्बा भी आबाद है। कहा जाता है आए थे दुश्मन बन कर पर बन गए दोस्त, और दोस्त भी ऐसा-वैसा नहीं हजारों लोगों के जीवन की रक्षा करने वाला।जबलपुर इटारसी रेलवे मार्ग में स्लीमनाबाद स्टेशन है। इसी कसबे का नाम 
 अंग्रेज अधिकारी कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के नाम से बसा है। 


कटनी जिले में एक कस्बा है स्लीमनाबाद जो अंग्रेज अधिकारी कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के नाम से बसा है। यह कस्बा उस अंग्रेज अधिकारी ने बसाया था जिसे इस क्षेत्र में ठग गिरोह को खत्म करने के लिए भेजा गया था । गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार सन् 1790-1840 के बीच इन गिरोह ने 931 सिरीयल किलिंग की जो कि विश्च रिकॉर्ड है। इस समस्या से निजात पाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष पुलिस दस्ता तैयार किया जिसकी कमान कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन को सौंपी गयी। कर्नल स्लीमन ने जब स्लीमनाबाद में अपनी छावनी बनाई तब भी इन ठग गिरोहों को खत्म करने का काम असंभव सा लगता था। लेकिन, अंग्रेज अधिकारी कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन ने अपनी एलआईबी पुलिस बनाकर इन्हें न सिर्फ पकड़ा वरन सैकड़ों ठगों को मौत के घाट उतार दिया।

इतने साल गुजर जाने के बाद भी कर्नल स्लीमन के वंशज स्लीमनाबाद आते रहते हैं। कुछ साल पहले इंग्लेंड से स्लीमन के परिजन स्लीमनाबाद आए थे। कर्नल विलियम हेनरी स्लीमन की सातवीं पीढ़ी के वंशज स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन लंदन निवासी स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन, ससेक्स निवासी भाई जेरेमी विलियम स्लीमन के साथ भारत आए तो सबसे पहले स्लीमनाबाद ही आए। स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन ने यहां लोगों से मुलाकात की और अपने पूर्वज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी स्थानीय लोगों से ली। इससे पहले साल 2001 तथा 2003 में भी स्लीमन के वंशज स्लीमनाबाद आए थे।

 ठगों का टीम वर्क


मध्य भारत के ठगों द्वारा ठगी की घटना को अंजाम देना कुशल संचालन, बेहतर समय-प्रबंधन और उत्तम टीम-वर्क के बेहतरीन उदाहरण के तौर पर भी याद किया जाता है। उस जमाने के ये ठग चार चरणों में ठगी को अंजाम देते थे। पहले चरण में ठगों की एक टोली जंगलों में छिपकर यात्रियों के समूहों का जायजा लेने की कोशिश करती थी कि किन यात्रियों के पास माल है। यह सुनिश्चित होने के बाद ये जानवारों की आवाज़ में (जिसे ये अपना कोड-वर्ड या ठगी जुबान कहते थे) अपनी दूसरी टोली को इसकी सूचना देते थे। दूसरे टोली यात्रियों के साथ उनके सहयात्रियों की तरह घुल-मिल जाते थे। साथ में भोजन पकाते थे, सोते थे और यात्रा करते थे। दूसरी टोली उन यात्रियों की एक अलग टोली बना लेती थी जिनके पास धन, सोने-चाँदी होते थे। फिर वे धोखे से उन्हें ज़हर खिलाकर या तो मार देते थे या बेहोश कर देते थे। लेकिन ये टोली उनसे धन लूटने का काम न करके अपनी तीसरी टोली को अपनी जुबान में बताकर अन्य यात्रियों के साथ लग जाती थी। तीसरी टोली आकर उन यात्रियों को पूरी तरह से लूट लेती थी। इस टोली के ठग साथ में खाकी या पीले रंग का रुमाल रखते थे, जिससे ये यात्रियों का गरौटा (गला) भी दबाते थे और सोने-चाँदी बाँध ले जाते थे। जाते-जाते ये अपनी चौथी टीम को सूचना दे जाते थे जो यात्रियों की लाशों को या तो कुएं में फेंक देती थी या पहले से तैयार क़ब्रों में दफऩ कर देती थी।

दो शताब्दी तक रहा खूनी ठगों का साम्राज्य 

ठगी का यह पेशा कोई नया नहीं है। मध्यकालीन भारत में तो यह धंधा एक प्रथा के रूप में प्रचलित था, जिसमें ठग लोग भोले-भाले यात्रियों को जहर आदि के प्रभाव से मूर्छित करके अथवा उनकी हत्या करके उनका धन छीन लेते थे। ठगी प्रथा का समय मुख्य रूप से 17 वीं शताब्दी के शुरू से 19वीं शताब्दी अंत। तक माना जाता है। मध्य भारत में प्रकोप की तरह फैले- रुमाल में सिक्कों की गांठ लगा कर रुपये-पैसे और धन के लिए यात्रियों के सिर पर चोट करके लूटने वाले ठग और पिंडारियों का आतंक 19वीं सदी के प्रारंभ तक इतना बढ़ गया कि ब्रिटिश सरकार को इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। ठगी प्रथा के कारण मुग़ल काल में नागपुर से उत्तर प्रदेश के शहर मिर्ज़ापुर तक बनी सडक़ पर यात्रियों का चलना मुश्किल हो गया था।

मप्र पुलिस और कर्नल स्लीमन 

स्थानीय लोगों के अनुसार उनके पूर्वज कहा करते थे कि मध्यप्रदेश की पुलिस के काम करने का तरीका भी कर्नल स्लीमन की तरह ही है। माना जाता है कि वर्तमान में पुलिस का एलआईबी डिपार्टमेंट कर्नल के काम करने के तरीके ही देन है। स्लीमन ने ठग और पिंडारियों के खात्मे के लिए अपनी (एलआईबी) मुखबिरों तंत्र को इतना अच्छा बनाया कि कर्नल के मुखबिर ठगों के साथ मिल जाते थे और उन्हें पता भी नहीं चलता था। इस एक वजह से वह इतने सारे ठग गिरोह का सफाया कर सके।


 फांसी का गवाह वह वृक्ष....


स्लीमनाबाद थाने में लगा बड़ा सा पीपल पेड़ पर ही ठग पिंडारियों को फांसी दी जाती थी। कुछ लोग मानते हैं कि जगह तो यही थी पर उस समय यहां पेड़ नहीं था। स्लीमनाबाद थाना का पुराना भवन कर्नल स्लीमन की चौकी माना जाता है। यहां स्लीमन की याद में एक स्मारक बनाया गया है। साथ ही दीवार पर स्लीमनाबाद की उत्पति संबंधी लेख भी लिखा है। जिसमें मप्र पुलिस का जनक कर्नल स्लीमन को बताया गया है।

Tuesday, 28 October 2014


28/10/2014

   बेवकूफ लोग ही चलते है क्या ,,ईमानदारी और नियम से..............?

जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होतें हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोडतें . एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलतें हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सर पर सवार रहतें हैं
इनमे से कुछ न कुछ प्राय सभी अधिकारी के जीवन में गुजरता है। अधिकारी छोटा हो या बड़ा मायने नही रखता है।
ईमानदारी और नियम से चलने के कारण ऐसे अधिकारियो को उन्हें बार-बार यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ स्थानांतरित किया जाता है। । उन्हें पदोन्नतियाँके अवसर भी कम ही मिलता है ,क्युकी ऐसे लोग अपने विभाग के उच्चाधिकारियों के नज़र से मुर्ख और बेवकूफ लोग ही होते है।
 शासकीय नौकरी . के सेवा काल मैं मैंने पाया कि बड़े अफसर भी लड़ते हैं और छोटी और बड़ी दोनो तरह की बातों पर - हाँ, इतना अवश्य है कि उनकी लडा़ई प्रायः खुलेआम न होकर लुकछिपकर होती है। इस लडा़ई के प्रायः बड़े 'ठोस' कारण होते हैं, जैसे :
1. मनभावन पद :
( महेश चंद्र द्रिवेदी एक पुलिस अधिकारी के जिनके भी जीवन में घठित संस्मरण से कुछ बाते भी ली गई है साभार )
1971 सेंट्रल पुलिस ट्रेनिंग कालेज, माउंट आबू सीनियर आफिसर्स कोर्स पूर्ण कर लखनऊ लौटने पर कई दिनों की प्रतीक्षा के उपरांत मेरी नियुक्ति एस.पी., बस्ती के पद पर कर दी गई थी, अतः आदेश मिलने की दूसरी शाम 27 मार्च को मैं कार से बस्ती के लिए चल पड़ा था। बाराबंकी में मेरे साढ़ू भाई डी.एम. नियुक्त थे, अतः रात्रि उनके साथ बिताने के इरादे से वहीं रुक गया। दूसरी सुबह जब मैं वहाँ से बस्ती के लिए चलने वाला था तो श्री सिंह, एस.पी., बस्ती का फोन आया कि मैं अभी बस्ती न आऊँ, दो-चार दिन बाद आऊँ। मैंने इसके पीछे अंतर्निहित कारण समझे बिना ही कह दिया,
'ठीक है, पर मैं फर्स्ट अप्रैल को चार्ज नहीं लेना चाहूँगा, अतः 31 तारीख को सुबह चलकर अपराह्न चार्ज ले लूँगा।'
31 तारीख को मेरे बस्ती पहुँचने पर श्री सिंह ने मुझे चार्ज सौंप दिया और मेरी आवभगत भी की, परंतु उनके बस्ती से जाने के बाद वहाँ के कई ब्राह्मणों, जो मेरे आने से प्रसन्न थे, ने मुझसे कहा, 'आप ने आने में देर क्यों कर दी, इस बीच उन्होंने कई एम.एल.एज. को अपना स्थानांतरण रुकवाने हेतु दौड़ा रखा था।'
मुझे तब तक यह भान नहीं था कि जनपद का एस.पी. बनने के लिए अन्य नियुक्तियों की अपेक्षा बड़ी मारकाट रहती है, पर बाद में मैंने पाया कि जिले के चार्ज के लिए न केवल मारकाट रहती है वरन आने वाले एस.पी. अथवा कलक्टर से जाने वाले एस.पी. अथवा कलक्टर की अनबन भी प्रायः हो जाती है क्योंकि जाने वाला यह सोचता है कि आने वाले ने उसे सप्रयत्न अपदस्थ कर दिया है। मुझे स्वयं यह स्थिति तब झेलनी पड़ी जब 1978 मैं एस.एस.पी., बरेली के पद पर तैनात हुआ। मेरे पूर्वाधिकारी अपना परिवार एस.एस.पी. के बँगले में छोड़कर नवनियुक्ति पर चले गए थे, अतः मैं सर्किट हाउस में रह रहा था। मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि मेरे पूर्वाधिकारी यानी म साहब की पत्नी अपने पति के बरेली से स्थानांतरण का दोषी मुझे मान रही हैं, अतः एक शाम मैं सौजन्यवश एस.एस.पी. बँगले पर अपने पूर्वाधिकारी के परिवार से मिलने चला गया। म साहब जरा कड़क मिजाज की निकलीं और उन्होंने मुझे बँगले, जो नियमानुसार मेरा हो चुका था, में अंदर आने को ही नहीं कहा; वरन म साहब की माँ बाहर निकलकर खा जाने वाली निगाहों से मुझे घूरते हुए बोलीं, '...... साहब तो गोरखपुर में हैं।' माता जी म साहब से अधिक कड़क मालूम पड़ीं और मैं उल्टे पाँव वापस सर्किट हाउस आ गया।
अभी कुछ माह पूर्व बदायूँ जनपद में डी.एम. के स्थानांतरण पर बडा़ रोचक प्रसंग घटित हुआ था। जनपद में एक्साइज के ठेके की नीलामी की तिथि निश्चित हो चुकी थी और पता नहीं शासन को क्या सूझी कि उस तिथि के ठीक दो दिन पहले वहाँ के डी.एम. का स्थानांतरण कर दिया। यह सर्वविदित है कि एक्साइज के ठेके में लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे होते हैं। नए डी.एम. साहब राकेट की स्पीड से कार चलवाकर रातों रात बदायूँ पहुँच गए और दूसरे दिन दस बजते ही चार्ज लेने की उत्कंठा डाक बँगले में डेरा डाल दिया। फिर सुबह होते ही डी.एम. के बँगले पर फोन पर फोन घुमवाना शुरू किया - पर डी.एम. साहब से सम्पर्क कैसे हो जब बँगले की सारी टेलीफोन लाइनें पहले ही काट दी गई थीं। जब नए डी.एम. साहब की बेचैनी बढ़ने लगी, तो वह बँगले के लिए रवाना हो गए,पर वहाँ से अपना-सा मुँह लेकर वापस होना पड़ा जब चपरासी से यह कहलवा दिया गया कि साहब वहाँ हैं नहीं और पता नहीं कि कहाँ गए हैं। पुराने डी.एम. साहब ठीक नीलामी के समय कलेक्टोरेट अवतरित हो गए और उन्होंने 'पूर्व-निर्धारित' ठेकेदारों के पक्ष में नीलामी करवा दी। तत्पश्चात उसी दिन नए डी.एम. को चार्ज मिल गया। कहते हैं कि एक्साइज के उन ठेकेदारों ने चपरासी से लेकर डी.एम. तक सभी का 'हक' पहले ही अदा कर दिया था, और नए डी.एम. के चार्ज ले लेने पर ठेकेदारों को दुबारा हक का भुगतान करना पड़ता, जिससे बचाने का 'नैतिक' दायित्व निभाने हेतु पुराने डी.एम. दो दिन के लिए अंतर्ध्यान हो गए थे।
कुछ वर्ष पूर्व अखबारों प्रदेश के अधिकारियों हेतु एक बड़ा मार्गदर्शक एवं प्रेरणादायक प्रसंग छपा था - 'एक महामहिम की राज भवन से रुखसती पर वहाँ रखे हुए कई बहुमूल्य तोहफे गा़यब पाए गए'। स्पष्ट है, कभी-कभी स्थानांतरण बड़े-बड़ों के लिए बड़ी मुफीद चीज साबित होते है।
कुछ वर्ष पूर्व अखबारों प्रदेश के अधिकारियों हेतु एक बड़ा मार्गदर्शक एवं प्रेरणादायक प्रसंग छपा था - 'एक महामहिम की राज भवन से रुखसती पर वहाँ रखे हुए कई बहुमूल्य तोहफे गा़यब पाए गए'। स्पष्ट है, कभी-कभी स्थानांतरण बड़े-बड़ों के लिए बड़ी मुफीद चीज साबित होते है।
2 . फसल :
डी. एम., एस.पी. आदि व जनपदीय अधिकारियों के बँगलों में काफी खाली जमीन हुआ करती है जो सरसों, गेहूँ, आलू आदि पैदा करने के काम आती है। इन फसलों के बोने में लगी लागत का उद्गम प्रायः . साहब को ज्ञात नहीं होता है वरन जनपद के कृषि विभाग के अधिकारियों को ज्ञात होता है क्योंकि स्थापित प्रथा के अनुसार जोतने-बोने, खाद-पानी लगाने से फसल कटवाने और उसे ऊँचे भाव पर बिकवाने का 'प्रशासनिक कर्तव्य' कृषि विभाग के अधिकारियों का बनता है। सरकार को हर वर्ष अच्छा मजाक सूझता है कि वह ऐन उसी वक्त तबादले का आदेश भेज देती है जब गेहूँ पक रहा होता है अथवा आलू खुदने को तैयार होने लगता है। फिर नया अधिकारी पद पर काबिज होने के कारण फसल पर अपना अधिकार समझता है और पुराना उस पर लगी लागत को स्वयं की गाढ़ी कमाई बताने लगता है। कभी-कभी तो बँटवारे के टर्म्स शांतिपूर्वक तय हो जाते हैं, पर कभी-कभी इस बँटवारे में मैडम साहिबान ऐसा भड़क जाती हैं कि दोनों अधिकारियो के रिश्तों के बीच फसल खड़ी होकर उन्हें चिढ़ाती रहती है। भड़काने के इस 'नेक' काम में अर्दली-चपरासी भी बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
3 . अर्दली - चपरासी :
यद्यपि एस.पी., डी.एम. जैसे अधिकारियों के आवास हर जनपद इयरमार्क्ड हैं और उन्हें नई पोस्टिंग पर आवास की कठिनाई प्रायः नहीं होती है, तथापि कभी-कभी स्थानांतरण पर जाते समय कुछ अफसर बच्चों की पढ़ाई के लिए अपने परिवार को कुछ दिनों के लिए पुराने बँगले पर छोड़ जाते हैं।
ऐसी स्थिति में नए अधिकारी का परिवार मजबूरी बँगले के बजाय डाक बँगले मे रुकता है - और फिर शुरू हो जाता है अर्दलियों-चपरासियों के बँटवारे पर शीत युद्ध, जो कभी-कभी अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर महाभारत भी बदल जाता है।
4 . जाति - पाँति -
हमारे देश के राजनीतिबाजों ने झगड़े का एक सर्वव्यापी कारण और पैदा कर दिया है जिससे अधिकारी अब एक नवीन नीति वाक्य के अनुगामी हो गए हैं :
जाति - पाँति पूछै सब कोई ,
सगो हमारी जाति को होई
यद्यपि समस्त समाज की भाँति सरकारी कर्मचारी प्रायः अपने सजातीय को ही सगा मानते हैं,, परंतु जातियों के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था हो जाने के उपरांत देखा गया है कि प्रायः किसी भी आरक्षित वर्ग (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य पिछड़ा वर्ग) से आरक्षण प्राप्त कर नियुक्त हुए अधिकारी अनारक्षित जातियों के अधिकारियों से एकमुश्त वैमनस्य रखते हैं - सम्भवतः इसके पीछे उनके मन में निहित हीन भावना इसका कारण होती है। उनमें बहुत-से आरक्षण के जातीय वर्गीकरण को अपने दुष्कर्मों के परिणाम से बचने का हथियार भी बनाते हैं।
एक . अधिकारी, जो अपनी अकर्मण्यता एवं बेईमानी के लिए कुख्यात थे, का मजबूर होकर बार-बार स्थानांतरण किया गया तो उन्होंने तत्कालीन उच्चाधिकारी के विरुद्ध ही शिकायत कर दी कि अनुसूचित जाति का होने के कारण उन्हें बार-बार स्थानांतरित किया जा रहा है।
उनके अनेक सजातीय अधिकारियों ने उनके इस प्रकार के घोर अनुशासनहीन आचरण की भर्त्सना करने के बजाय गुपचुप रूप से उनकी मदद ही की और अपने अघीन नियुक्त होने पर उन्हें सर्वोत्तम वार्षिक टिप्पणी दी।
मैं तो सदैव यही मनाता रहा हूँ और आज भी मनाता हूँ कि हे ईश्वर, तू मुझे अधिकारियों के झगड़े से बचा।